संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर पूर्व जजों की चिंता: खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग और SIR का किया बचाव
नई दिल्ली: देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर पूर्व न्यायाधीशों और संवैधानिक पदों से जुड़े सेवानिवृत्त लोगों के एक प्रमुख समूह ने गहरी चिंता व्यक्त की है। 7 अक्टूबर 2026 को जारी एक खुले पत्र, जिसका शीर्षक ‘An Open Letter to the People of India In Defence of Our Constitutional Institutions’ है, में कहा गया है कि संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सुनियोजित हमले किए जा रहे हैं, और इसमें चुनाव आयोग इस पूरी बहस के केंद्र में बना हुआ है। इस पत्र में उच्च न्यायपालिका और अन्य वैधानिक एजेंसियों की स्थिति को लेकर भी गंभीर चिंता जाहिर की गई है।
⚖️ बिना प्रमाण आरोप लगाने पर उठाए गए सवाल और SIR प्रक्रिया का समर्थन
खुले पत्र में कहा गया है कि हालांकि किसी भी संस्था की आलोचना करना एक लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें बिना किसी ठोस आधार के ‘अविश्वसनीय’, ‘कठपुतली’ या ‘समझौता किया हुआ’ बताना पूरी तरह अनुचित है।
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वोट चोरी और ईवीएम के मुद्दे: पत्र में स्पष्ट किया गया कि सार्वजनिक मंचों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में वोट चोरी या ईवीएम जैसे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, लेकिन जब संबंधित संस्थाओं द्वारा साक्ष्य या शपथपत्र मांगे जाते हैं, तो पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आते। चुनाव में हार के बाद मशीनों पर सवाल उठाए जाते हैं, जबकि जीत मिलने पर उन्हीं मशीनों पर कोई संदेह नहीं किया जाता।
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SIR प्रक्रिया की वैधता: पत्र में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) का पुरजोर समर्थन किया गया है। इसमें जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 21(3) का हवाला देते हुए बताया गया कि आयोग को मतदाता सूची में संशोधन का पूरा कानूनी अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसके उद्देश्य को वैध ठहराया है और इस प्रक्रिया में सुनवाई व अपील के पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।
🤝 राजनीतिक दलों, मीडिया और नागरिकों से अपील
पूर्व न्यायाधीशों ने सभी संबंधित पक्षों को निष्पक्ष और जिम्मेदार रवैया अपनाने की सलाह दी है:
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राजनीतिक दल और मीडिया: राजनीतिक दलों से अपील की गई है कि वे चुनाव जरूर लड़ें, लेकिन चुनावी प्रक्रिया की वैधता को ही दांव पर न लगाएं। मीडिया को भी बिना जांचे-परखे अटकलों और आरोपों को प्रमुखता से आगे न बढ़ाने की हिदायत दी गई है।
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संस्थाएं जनता की हैं: पत्र के अंत में इस बात पर जोर दिया गया है कि संवैधानिक संस्थाएं किसी एक सरकार या राजनीतिक दल की बपौती नहीं, बल्कि भारत की आम जनता की हैं।
इस खुले पत्र पर सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई दिग्गज पूर्व न्यायाधीशों के हस्ताक्षर हैं, जिनमें जस्टिस हेमंत गुप्ता, जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस बी.सी. पटेल समेत देश भर के कई सेवानिवृत्त न्यायविद् शामिल हैं।

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