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Neeru Dhanda Gold Medal: उधार की बंदूक से एशियन गेम्स में गोल्ड तक! अस्पताल से निकलकर नीरू ढांडा ने रचा इतिहास

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भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। कभी उधार की बंदूक, भोपाल के एक तालाब के किनारे अभ्यास और रिश्ते के भाई के प्रोत्साहन से शुरुआत करने वाली 26 वर्षीय नीरू ढांडा ने एशियाई खेलों में देश का परचम लहरा दिया है।

नीरू ने महिला ट्रैप स्पर्धा में रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन करते हुए ऐतिहासिक स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके साथ ही वह एशियाई खेलों के इतिहास में व्यक्तिगत शॉटगन स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला निशानेबाज बन गई हैं। अपने ममेरे भाई लक्ष्य श्योराण के पिता की साधारण देसी बंदूक से टिन के डिब्बों पर निशाना साधने से लेकर अंतरराष्ट्रीय पोडियम के शीर्ष पर पहुंचने तक नीरू का यह सफर अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प की मिसाल है।

हरियाणा के जींद जिले के एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली नीरू के पास वर्ष 2019 में जब वह भोपाल पहुंची थीं, तब निशानेबाजी का महज छह महीने का मामूली अनुभव था। मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी द्वारा प्रदान की गई मुफ्त राइफल, कारतूस और उच्च स्तरीय कोचिंग ने उनके सपनों को नई उड़ान दी। इससे पहले उनके भाई लक्ष्य श्योराण ने 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में रजत पदक जीता था, जिससे प्रेरित होकर नीरू ने इस बेहद खर्चीले खेल में कदम रखने का साहसिक निर्णय लिया था।

🎯 टिन के डिब्बों पर साधा था पहला निशाना: परिवार की तंगहाली के बीच अकादमी बनी सहारा

शुरुआती संघर्ष और प्रशिक्षण का दौर:

  • शुरुआत में खेल की नहीं थी समझ: ऐतिहासिक विजय के बाद भावुक नीरू ने बताया कि शुरुआत में उन्हें शूटिंग की बुनियादी बारीकियों तक की जानकारी नहीं थी। भाई लक्ष्य के पदक से प्रेरित होकर उन्होंने केवल लक्ष्य साधने की जिद ठान ली थी।

  • तालाब किनारे अभ्यास: उन्होंने अपने चाचा की बंदूक से भोपाल के बड़े तालाब के किनारे टिन के डिब्बों को दूर रखकर अभ्यास शुरू किया और खुद की गलतियों से सीखते हुए निशानेबाजी की तकनीक विकसित की।

  • अकादमी का मिला मजबूत संबल: लक्ष्य के माता-पिता ही उन्हें मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी लेकर पहुंचे। किसान पिता और गृहिणी मां के लिए इस महंगे खेल का खर्च उठाना नामुमकिन था, लेकिन अकादमी के मुफ्त कारतूस और आधुनिक बंदूकों के सहयोग ने उनके संघर्ष को स्वर्णिम मुकाम तक पहुंचा दिया।

  • विश्व कप के बाद एशिया में जलवा: इटली के लोनाटो में आयोजित विश्व कप में पदक जीतने के बाद नीरू का यह एशियाई स्वर्ण भारत के लिए महिला शॉटगन स्पर्धा में दशकों पुराने सूखे को समाप्त करता है।

🏥 प्रतियोगिता से 10 दिन पहले अस्पताल में भर्ती: 5 दिन तक केवल पानी पीकर रहीं जिंदा

बीमारी और शारीरिक कमजोरी से जंग:

  • गंभीर बीमारी से बिगड़ी हालत: यह ऐतिहासिक स्वर्ण पदक नीरू ने अत्यंत विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच हासिल किया है। मुख्य स्पर्धा से महज 10 दिन पहले वह गंभीर संक्रमण की चपेट में आकर अस्पताल में भर्ती हो गई थीं।

  • कैंप से रहीं बाहर: बीमारी की गंभीरता के कारण वह पूरे अंतिम प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा नहीं ले सकीं और शारीरिक कमजोरी के चलते उन्होंने लगातार पांच दिनों तक अन्न का एक दाना भी नहीं खाया, केवल पानी के सहारे दिन काटे।

  • कोच मनशेर सिंह का भरोसा: शारीरिक रूप से बेहद कमजोर होने के बावजूद उनके मार्गदर्शक और कोच मनशेर सिंह ने लगातार फोन पर उनसे संवाद बनाए रखा और उनका मनोबल गिरने नहीं दिया। उन्होंने नीरू को भरोसा दिलाया कि उनका वर्षों का समर्पण कुछ दिनों की बीमारी से कमजोर नहीं पड़ सकता।

🌧️ नागोया में बारिश और ठंड की कड़ी परीक्षा: ध्यान भटकाने वाली तकनीक ने दिलाई जीत

प्रतिकूल मौसम और मानसिक मजबूती:

  • फिसलन और बदलती ग्रिप: जापान के नागोया में जारी मूसलाधार बारिश और गिरते तापमान ने फाइनल मुकाबले के दौरान निशानेबाजों की तकनीक की कड़ी परीक्षा ली। बारिश के कारण बंदूक की ग्रिप गीली होकर फिसल रही थी, किंतु नीरू ने अपनी एकाग्रता को तनिक भी भंग नहीं होने दिया।

  • कड़े अभ्यास की मिली मदद: नीरू के कोच अभ्यास सत्र के दौरान जानबूझकर ध्यान भटकाने वाले माहौल बनाते थे—जैसे निशाना साधते वक्त जैकेट खींचना, आगे कुर्सी रख देना या बहुत तेज संगीत बजाना। इस अनूठी ट्रेनिंग ने उन्हें दबाव भरी परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होने दिया।

🎖️ भारतीय सेना और सीमा पर तैनात जवानों को समर्पित किया पदक: राजा रणजीत सिंह को दी श्रद्धांजलि

देशभक्ति और सम्मान का भाव:

  • सैनिकों के त्याग को नमन: भारतीय सेना की तरफ से खेलने वाली निशानेबाज नीरू ने अपने इस ऐतिहासिक स्वर्ण पदक को देश की सीमाओं पर तैनात वीर सैनिकों को समर्पित किया। उन्होंने गर्व से कहा कि सीमाओं पर प्राण न्योछावर करने वाले जांबाजों के त्याग के सामने यह पदक जीतना एक छोटा सा कर्तव्य है।

  • पूर्व चैंपियन को श्रद्धांजलि: इसके साथ ही नीरू ने अपना यह ऐतिहासिक पदक 1978 के एशियाई खेलों के महान चैंपियन स्वर्गीय राजा रणजीत सिंह की पावन स्मृति को भी समर्पित किया, जिनका इसी वर्ष निधन हुआ है।

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