MP High Court On POCSO Act: ‘लंबित हैं 14,531 मामले’; मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पॉक्सो केसों में बढ़ोतरी पर जताई गहरी चिंता
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य में बच्चों के संरक्षण से जुड़े पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों की बढ़ती संख्या पर बेहद गंभीर चिंता व्यक्त की है। हाईकोर्ट की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि वर्तमान में प्रिंसिपल बेंच जबलपुर सहित इंदौर और ग्वालियर बेंचों के समक्ष पॉक्सो से संबंधित 14,531 आपराधिक अपीलें व प्रकरण लंबित हैं। अदालत ने माना कि समाज में पॉक्सो कानून के कड़े प्रावधानों के प्रति जानकारी का अभाव है, जिसके लिए व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने की तत्काल आवश्यकता है।
📢 जन-जागरूकता अभियान के लिए याचिका दायर: राज्य सरकार ने पेश किया 4.5 लाख लोगों को जागरूक करने का ब्योरा
पॉक्सो एक्ट के प्रति जन-जागरूकता फैलाने की मांग को लेकर अधिवक्ता अभिताव गुप्ता की ओर से हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिस पर स्वतः संज्ञान याचिका के साथ सुनवाई हुई।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश जवाब में बताया गया कि विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए हैं। राज्य स्तरीय कार्यक्रमों में लगभग 52 हजार और जिला स्तरीय आयोजनों में 2,73,701 पुलिसकर्मियों, विद्यार्थियों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं व बाल संरक्षण स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया गया है। वहीं गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के माध्यम से लगभग 4.50 लाख लोगों तक जागरूकता पहुँचाई गई है।
👥 अधिकांश मामलों में पीड़ित 16 से 18 और आरोपी 19 से 22 वर्ष के: कानून की अज्ञानता बन रही मुख्य वजह
हाईकोर्ट की युगलपीठ ने अपने विस्तृत आदेश में रेखांकित किया कि लंबित अपीलों में से अधिकांश मामलों में पीड़ितों की आयु 16 से 18 वर्ष और आरोपियों की आयु 19 से 22 वर्ष के बीच है।
अदालत ने टिप्पणी की कि युवा और कम उम्र के आरोपी कानून की जानकारी न होने के कारण जेलों में बंद हैं। कई मामलों में लड़का और लड़की इस बात से बिल्कुल अनजान होते हैं कि आपसी सहमति, प्रेम संबंध या बिना बताए घर से चले जाने जैसी परिस्थितियां भी पॉक्सो कानून के तहत गंभीर गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आती हैं।
📺 धारा 43 का हवाला देकर व्यापक प्रचार-प्रसार पर जोर: टीवी, रेडियो और प्रिंट मीडिया के उपयोग के निर्देश
युगलपीठ ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 43 का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि केंद्र और राज्य सरकारों का यह संवैधानिक दायित्व है कि वे इस कानून के प्रावधानों का नियमित रूप से व्यापक प्रचार-प्रसार करें।
अदालत ने निर्देश दिया कि टेलीविजन, रेडियो, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से आम जनता को इस कानून की विधिक बारीकियों और परिणामों के बारे में निरंतर जागरूक किया जाए, ताकि नए अपराधों की रोकथाम की जा सके।
🏛️ हाईकोर्ट की विशेष कमेटी करेगी निगरानी: याचिकाओं का निपटारा, अभिताव गुप्ता बने न्याय मित्र
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबित मामलों का त्वरित निपटारा तभी संभव होगा जब नए दर्ज होने वाले मुकदमों की संख्या में कमी आए।
इसके लिए युगलपीठ ने हाईकोर्ट रजिस्ट्रार (DE) को पॉक्सो और पीसी एंड पीएनडीटी (PC-PNDT) एक्ट से संबंधित मामलों की प्रगति की सतत निगरानी का जिम्मा सौंपा है। यह विशेष कमेटी राज्य सरकार के अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर सकेगी। कोर्ट ने दो याचिकाओं को अंतिम रूप से निराकृत करते हुए केवल संज्ञान याचिका पर सुनवाई जारी रखने का निर्णय लिया है और अधिवक्ता अभिताव गुप्ता को इस विषय में ‘न्याय मित्र’ (Amicus Curiae) नियुक्त किया है।
ℹ️ जानिए क्या है पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) और इसके प्रावधान
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पूरा नाम: प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस एक्ट, 2012 (Protection of Children from Sexual Offences Act)।
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लागू होने की तिथि: यह कानून 14 नवंबर 2012 को देश भर में लागू हुआ था।
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उद्देश्य: 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन शोषण, उत्पीड़न और पोर्नोग्राफी जैसे गंभीर अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना।
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सजा के प्रावधान: इस अधिनियम के तहत अपराध की गंभीरता के आधार पर न्यूनतम 3 वर्ष से लेकर 20 वर्ष तक का कठोर कारावास, आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक का कड़ा कानूनी प्रावधान है।
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