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O Romeo Review: शाहिद का एक्शन और नाना पाटेकर की दहाड़ भी नहीं बचा पाई फिल्म! ये हैं वो 5 बड़ी कमियां

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O Romeo News: इंतजार की घड़ियां खत्म हो गई हैं. विशाल भारद्वाज की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘ओ रोमियो’ आज थिएटर में दस्तक दे चुकी है. इस फिल्म के साथ शाहिद कपूर एक बार फिर ‘कमीने’ और ‘हैदर’ वाले डार्क अवतार में लौटे हैं, साथ में तृप्ति डिमरी की फ्रेशनेस और नाना पाटेकर का वो कड़क अंदाज भी है. लेकिन, क्या विशाल भारद्वाज ने ‘ओ रोमियो’ के साथ फिर से ‘ओमकारा’ जैसा जादू बिखेरा है? या फिर इस बार ‘रोमियो’ का तीर निशाने से चूक गया है?

ओ रोमियो‘ देख कर निकले दर्शकों और क्रिटिक्स के बीच सुगबुगाहट तेज है. हमने भी रीडर्स के लिए किया है इस फिल्म का गहरा पोस्टमार्टम और निकाली हैं वो 5 बड़ी कमियां, जो फिल्म के ‘ब्लॉकबस्टर’ बनने की राह में रोड़ा बन सकती हैं.

1. कन्फ्यूजिंग स्क्रीनप्ले

विशाल भारद्वाज अपनी फिल्मों में ‘लेयर्स’ के लिए जाने जाते हैं, लेकिन ‘ओ रोमियो’ में लेयर्स इतने ज्यादा हैं कि दर्शक बेचारा प्याज की तरह छिलता रह जाता है. फिल्म की शुरुआत धीमी लेकिन असरदार होती है, लेकिन सेकंड हाफ में कहानी इतनी उलझ जाती है कि आपको समझ नहीं आता कि आप शेक्सपियर का नाटक देख रहे हैं या कोई डार्क साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म.

2. शाहिद का ‘ओवर द टॉप’ पैशन

इसमें कोई शक नहीं कि शाहिद कपूर एक पावरहाउस परफॉर्मर हैं. ‘ओ रोमियो’ में उन्होंने अपनी पूरी आत्मा झोंक दी है. लेकिन कुछ सीन्स में वो इतने ज्यादा इंटेंस हो गए हैं कि लगता है वो ‘कबीर सिंह’ और ‘हैदर’ का मिक्सचर बन गए हैं. उनका चिल्लाना और इमोशनल ब्रेकडाउन कुछ जगहों पर ‘क्रिंज’ लगने लगता है और हम शाहिद का पुराना चॉकलेट बॉय वाला अंदाज मिस करने लगते हैं.

3. तृप्ति डिमरी और शाहिद कपूर की केमिस्ट्री

फिल्म में तृप्ति डिमरी (जूलियट के किरदार में) बला की खूबसूरत लगी हैं और उनकी एक्टिंग भी दमदार है. विशाल भारद्वाज ने उनके टैलेंट का पूरा इस्तेमाल भी किया है. लेकिन फिल्म में शाहिद और तृप्ति से ज्यादा शाहिद और नाना पाटेकर या फिर शाहिद और दिशा पटानी की केमिस्ट्री नजर आती हैं.

4. असरदार नहीं है नया म्यूजिक

विशाल भारद्वाज की फिल्मों की जान उनका संगीत होता है. लेकिन ‘ओ रोमियो’ का म्यूजिक औसत है. गाने सुनने में अच्छे हैं, लेकिन वो ‘लॉन्ग लास्टिंग’ इम्पैक्ट नहीं छोड़ पाते जो ‘ओमकारा’ या ‘मकबूल’ के गानों ने छोड़ा था. कोई भी ऐसा ‘चार्टबस्टर’ गाना नहीं है जिसे आप थिएटर से बाहर निकलते वक्त गुनगुना सकें. गुलजार साहब के गानों के बोल गहरे तो यहां हैं, लेकिन ज्यादातर समय वो आम जनता के सिर के ऊपर से निकल जाते हैं.

5. नाना पाटेकर जैसे टैलेंट की ‘बर्बादी’!

फिल्म में नाना पाटेकर का होना ही एक बड़ी बात है. उनके डायलॉग डिलीवरी का वही पुराना अंदाज है, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें कुछ नया करने का मौका ही नहीं देती.

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