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Hazaribagh Sohrai Art: ड्राइंग रूम से किचन तक पहुँची 500 साल पुरानी सोहराय कला, अब आधुनिक घरों की शान बन रही झारखंड की विरासत

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हजारीबागः 5000 साल से भी अधिक पुरानी सोहराय कला अब नए स्वरूप में दिख रही है. गुफाओं और मिट्टी की दीवारों से निकलकर यह कला अब ड्राइंग रूम तक पहुंचकर घरों की शोभा बढ़ा रही है. इसे पूरा करने में आदिवासी समाज की महिलाएं का महत्वपूर्ण योगदान है. महिलाएं सोहराय कला के जरिए प्लेट, वॉल हैंगिंग समेत कई तरह के उत्पाद बना रही हैं.

हजारीबाग के बड़कागांव के इसको गुफा में सोहराय कला आज भी देखी जा सकती है. जिसका इतिहास 5000 साल से भी अधिक पुराना है. हजारीबाग की आदिवासी समाज की महिलाएं सोहराय के बदलते स्वरूप को घरों तक पहुंच रही हैं. अब सोहराय कला बैग से लेकर प्लेट, वॉल हैंगिंग, अंग वस्त्र में भी जगह ले रही है.

सोहराय कला को किया जा रहा प्रमोट

हजारीबाग में सोहराय कला को प्रमोट करने के लिए मेले का आयोजन किया गया है.मेले में सोहराय कला के जरिए बनाए गए वाटर बैग, वॉल हैंगिंग, मनी बैग, मिट्टी के बर्तन, प्लेट आदि की प्रदर्शनी लगाई गई है.

कला को घर-घर तक पहुंचाने की मुहिम

महिलाएं कहती हैं कि जमाना बदल रहा है. ऐसे में खुद को अपडेट करना चाहिए. सोहराय कला जो विलुप्त होने की कगार पर है उसे नई पहचान देने की कोशिश की जा रही है. अगर हर एक घर तक सोहराय कला पहुंचेगी तो इसकी जानकारी भी लोगों को होगी. इसी उद्देश्य से नया प्रयास किया जा रहा है.

महिलाएं बताती हैं कि उन्होंने सोहराय कला के जरिए विभिन्न उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त किया है. उसके बाद एक रणनीति के तहत ऐसे उत्पाद को चुना गया जिसका उपयोग सबसे अधिक होता है और लोगों के घरों तक पहुंच सके. इसे देखते हुए सोहराय कला के जरिए कई उत्पाद बनाए गए.

सोहराय कला से बने उत्पाद आकर्षण का केंद्र

महत्वपूर्ण बात यह है कि लोग ऐसे उत्पादों को पसंद भी करते हैं. जब चाय या नाश्ता सोहराय के उकेरे हुए प्लेट पर मिलता है तो लोगों की पहली नजर उस कला पर पड़ती है. जिससे उसके बारे में लोग जानकारी इकट्ठा करते हैं. इस तरह यह कला अब घर-घर तक पहुंच रही है.आदिवासी समाज की महिलाएं अपने घरों में इस तरह का उत्पादन बना रही हैं. जिसकी प्रदर्शनी हजारीबाग में लगाई गई है. मेला घूमने आने वाले लोग उत्पादों को पसंद कर रहे हैं और खरीद रहे हैं. प्रदर्शनी में स्टॉल लगाने वाली महिलाओं ने बताया कि इसका दोहरा लाभ हो रहा है. पहले तो महिलाएं आर्थिक रूप से संपन्न हो रही है, वहीं दूसरी ओर कलाकृति भी लोगों के घरों तक पहुंच रही है.

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