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स्वर्ग से धरती पर कैसे आया कल्पवृक्ष? जानें समुद्र मंथन से निकले इस अनमोल रत्न की पूरी कहानी

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झारखंड के रांची के डोरंडा क्षेत्र में 3 कल्पतरु वृक्ष इस समय लोगों के बीच आस्था का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से एक रत्न कल्पतरु वृक्ष को माना जाता है. इसे कल्पवृक्ष और कल्पद्रुम जैसे नामों से भी जाना जाता है. मान्यता है कि यह कोई साधारण पेड़ नहीं, बल्कि एक दिव्य वृक्ष है.

ऐसी आस्था है कि कल्पतरु वृक्ष के नीचे सच्चे मन से मांगी गई इच्छाएं पूरी होती हैं. समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से एक होने के कारण कारण रांची के डोरंडा क्षेत्र की मुख्य सड़क से गुजरने वाले लोग किसी धार्मिक स्थल की तरह पेड़ के सामने रुककर अपनी बेहतरी की कामना करते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं. दुर्लभ और दिव्य होने के साथ-साथ यह वृक्ष औषधीय गुणों से भी भरपूर माना जाता है.

अमृत के साथ हुई इस पेड़ की उत्पत्ति

पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान अमृत के साथ इस वृक्ष की भी उत्पत्ति हुई थी. कहा जाता है कि यह वृक्ष इंद्र देव को प्राप्त हुआ था और उन्होंने इसे स्वर्ग के सुरकानन वन में स्थापित किया. ऐसी मान्यता है कि यह पेड़ सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना को पूरी करने की शक्ति रखता है. इस दुर्लभ कल्पतरु वृक्ष को बचाने और संरक्षित करने के साथ-साथ लोगों को इसके महत्व से रूबरू कराने के उद्देश्य से झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने यहां एक नोटिस बोर्ड लगाया गया है.

250 साल से ज्यादा पुराना और दुर्लभ

इसमें रांची में मौजूद तीनों कल्पतरु पेड़ों को सुरक्षित रखने, इनके 250 साल से ज्यादा पुराने होने और दुर्लभ होने की जानकारी अंकित की गई है. वहीं वन-पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि कल्पतरु का पेड़ कई गंभीर बीमारियों से राहत दिलाने में भी कारगर होता है. इसकी पत्तियों और छाल का इस्तेमाल आयुर्वेद के रूप में किया जाता है. यह किडनी, लीवर और फेफड़ों से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोगी साबित होता है.

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