ओरछा : बुंदेलखंड की अयोध्या कही जाने वाली धार्मिक नगरी ओरछा में धार्मिक आयोजन सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि 450 वर्षों से चली आ रही जीवित परंपरा का दिव्य दर्शन है. समय के साथ यहां बहुत कुछ बदलाव भी हुआ है लेकिन भगवान श्रीराम की बारात में कुछ परंपराएं आज भी वैसी ही हैं. इनमें खजरी का मुकुट, चांदी का त्रिकोना, छड़ी और मशाल हैं. ये परंपराएं केवल रस्में नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की आध्यात्मिक-सांस्कृति क धरोहर का अभिन्न हिस्सा हैं.
खजरी की पत्ती के मुकुट का महत्व
विवाह के पूर्व नगर में विशाल दीपोत्सव भी मनाया गया, जिसमें लगभग एक लाख दीपकों को प्रज्वलित किया गया. साहित्यकार हेमन्त गोस्वामी बताते हैं भगवान श्रीराम को विवाह पंचमी के दिन खजरी (पाम) की पत्तियों से बना मुकुट धारण कराना केवल परंपरा नहीं, बल्कि तीर्थ परंपराओं से जुड़ी गहरी आध्यात्मिक मान्यता है.ओरछा में रामराजा सरकार साक्षात राजा के रूप में विराजमान हैं. इसलिए यह मुकुट राज-आभूषण की तरह पहनाया जाता है. खजरी की पत्ती को प्राचीन काल से अशुभ प्रभावों और नकारात्मक ऊर्जा से बचाने वाला माना जाता है.
रात में निकलेगी भगवान श्री राम की बारात
बुंदेलखंड की प्राचीन परंपरा के अनुसार आज भी दूल्हे को खजरी का मुकुट धारण कराया जाता है, जिससे उन पर किसी बुरी नजर या अशांत प्रभाव का असर न दिखे. मंगलवार को शाम 7 बजे इसी राजसी ठाट बाट के साथ दूल्हा सरकार की बारात निकलेगी. रात 12 बजे बारात नगर के मुख्य चौराहे पर स्थित जानकी मंदिर पहुंचेगी. यहां मंदिर के पुजारी हरीश दुबे द्वारा तिलक किया जाएगा. इसके बाद सभी वैवाहिक रस्में पूरी होंगी.
रात्रि में मंदिर प्रांगण में धनुष यज्ञ लीला
इस अवसर पर देश के चुनिंदा कलाकारों द्वारा मंदिर प्रांगण में धनुष यज्ञ की लीला का मंचन किया जाएगा. पूरी ओरछा नगरी को दुल्हन की तरह सजा दिया गया है. बारात के दिन पूरे नगर में लोग अपने-अपने द्वारों पर दीप जलाकर और फूलमालाओं से सजावट कर बारात का इंतजार करते हैं और बारात आने पर उसका भव्य स्वागत किया जाता है. ओरछा निवासी वरिष्ठ साहित्यकार ओमप्रकाश दुबे बताते हैं कि विवाह पंचमी की शोभायात्रा में त्रिकोना धर्म-अर्थ-काम का संकेत देता है.
श्रीराम की बारात में मशाल का महत्व
साहित्यकार ओमप्रकाश दुबे बताते हैं यह ब्रह्मा-विष्णु-महेश और त्रिगुण सत्व-रज-तम का भी प्रतिनिधि है. बारात में त्रिकोना आगे चलना यह घोषणा होती है कि देवता की यात्रा शुरू हो चुकी है और मार्ग पवित्र है. छड़ी राजकीय मर्यादा और अनुशासन का प्रतीक है. मशाल पवित्र अग्नि और मार्ग शुद्धि का प्रतीक है. इसलिए आज भी राम बारात में मशाल परंपरा यथावत जारी है.
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