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यूएस टैरिफ से पानी के मोल हुआ सिवनी और मंडला का सिंघाड़ा, एक्सपोर्ट ब्रेक से किसानी बंद!

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जबलपुर: सिंघाड़ा एक सुपर फूड है. इसमें औषधीय और बलवर्धक गुण हैं, लेकिन इसके बावजूद सिंघाड़ा उत्पादक किसान अब इसकी खेती बंद करना चाहते हैं. दरअसल, सिंघाड़े का निर्यात बंद होने की वजह से इसके दामों में भारी कमी आई है. इस साल सिंघाड़े के दाम मात्र 15 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गये हैं. इसकी वजह से किसानों की लागत तक नहीं निकल रही है. इसलिए किसान सरकार से मदद की उम्मीद लगा रहे हैं.

काफी कठिन है सिंघाड़े की खेती

सिंघाड़े की खेती कृषि क्षेत्र में सबसे कठिन खेती मानी जाती है. इसमें मेहनत और सालों का हुनर के बाद ही सिंघाड़े का उत्पादन होता है. सिंघाड़े को आयुर्वेद में दवा के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. यह एक बलवर्धक फल है. भारत में इसका उपयोग व्रत के दौरान खाने में किया जाता है. सिंघाड़े की प्रोसेसिंग भी होती है और इसका आटे के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. इसके कई व्यंजन बनते हैं.

पूरे साल करनी पड़ती है मेहनत

जबलपुर के रहने वाले अशोक बर्मन इस खेती से बीते 40 साल से जुड़े हुए हैं. उनकी उम्र लगभग 55 साल है और जब वे मात्र 15 साल के थे तब से ही उन्होंने सिंघाड़े की खेती करना शुरू कर दिया था. अशोक बर्मन का कहना है कि “सिंघाड़े की खेती पूरे साल मेहनत करनी पड़ती है. मकर संक्रांति के समय पके हुए सिंघाड़े को अंकुरित होने के लिए रखा जाता है और जब इसमें अंकुर आ जाता है, तब इसे रोपा जाता है.”

तालाब में लगाए जाते हैं सिंघाड़े

सिंघाड़े के बीज को सामान्य खेत में रोपाई नहीं की जाती, बल्कि सिंघाड़े को ऐसे तालाब में लगाया जाता है, जिसमें कम से कम 4 फीट पानी पूरे साल बना रहे. पानी के नीचे जमीन पर इसे रोपा जाता है. धीरे-धीरे इसमें एक बेल निकलती है, जो पानी की सतह तक पहुंच जाती है. यहां पर इसके पत्ते फैलते हैं. इस दौरान किसान बेल को पानी के भीतर सीधा करता है, ताकि वे आपस में न उलझे. यह काम बड़ा कठिन होता है और इसमें एक छोटी सी नाव में अशोक बर्मन जैसे किसान पूरे दिन काम करते हैं. जनवरी में जिस सिंघाड़े को तालाब में लगाया जाता है, वह अक्टूबर में निकलना शुरू होता है.

निर्यात बंद होने की वजह से नहीं है मांग

जबलपुर के निवाड गंज सब्जी मंडी में सिंघाड़ा की ट्रेडिंग करने वाले राजीव यादव बताते हैं कि “जबलपुर, सिवनी, मंडला और कटनी के कुछ इलाकों से सिंघाड़ा जबलपुर आता है और यहां से कोलकाता, गुजरात, मुंबई भेजा जाता है. सभी जगह के व्यापारी जबलपुर आते हैं और खरीद कर ले जाते हैं. लेकिन इस साल मांग बहुत कम है. इसलिए किसानों को भारी नुकसान हो रहा है. उनकी लागत भी नहीं निकल पा रही है.”

राजीव ने बताया कि “गुजरात में कुछ फैक्ट्रियां थीं, जो सिंघाड़े की प्रोसेसिंग करती थीं और प्रोसेस्ड माल अमेरिका भेजा जाता था. लेकिन नीतियों में परिवर्तन हुआ है, जिसके चलते गुजरात की फैक्ट्रियां बंद हैं. इसकी वजह से सिंघाड़े के खरीददार घट गए हैं और दाम नहीं बढ़ रहे.”

अमेरिका के 50% टैरिफ का पड़ा बुरा असर

जबलपुर में सिंघाड़ा की ट्रेडिंग करने वाले राजीव यादव ने बताया कि “उनका माल गुजरात की एक कंपनी को भेजा जाता था. जहां इसकी प्रोसेसिंग होती थी. लेकिन यह कंपनी बीते कुछ दिनों से बंद पड़ी है. कंपनी के लोगों से संपर्क किया, तो पता लगा कि कंपनी बड़े पैमाने पर प्रोसेस्ड सिंघाड़े को अमेरिका भेजती थी, लेकिन अब यह माल अमेरिका जाना बंद हो गया है. इसकी वजह से कंपनी भी बंद हो गई है.”

वर्तमान में अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा रखा है, जिसके कारण भारतीय उत्पादों का निर्यात प्रभावित हुआ है. इसका खामियाजा सिंघाड़ा खरीदने वाली फैक्ट्रियों को भी भुगतना पड़ रहा है, जिससे सिंघाड़े की मांग कम हुई है.

‘सिंघाड़ा उत्पादन के लिए बैंक नहीं देती लोन’

आदर्श कुसमरिया, मंडला से सिंघाड़ा बेचने के लिए जबलपुर की मंडी में आए थे. आदर्श ने आईटीआई से डिप्लोमा और पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की है, लेकिन कहीं नौकरी नहीं मिलने के बाद उन्होंने सिंघाड़े की खेती शुरू की. यह उनका पुश्तैनी कारोबार था, लेकिन इस साल आदर्श परेशान हैं. आदर्श का कहना है कि “उन्हें सरकार की ओर से भी कोई मदद नहीं मिलती. यहां तक की बैंक, सिंघाड़ा किसान को लोन तक नहीं देता, क्योंकि इस खेती को तकनीकी खेती नहीं माना जाता है.”

किराए पर तालाब लेकर करते हैं सिंघाड़े की खेती

सिंघाड़ा उत्पादन करने वाले किसान ज्यादातर या तो मालगुजार के तालाब किराए से लेते हैं या फिर सरकारी तालाबों को किराए से लेते हैं. ज्यादातर स्थानों पर मछली पालन होता है और जहां मछली पालन होता है, वहां सिंघाड़े की खेती नहीं होती. ऐसी स्थिति में सिंघाड़ा पैदा करने के लिए तालाब बड़े महंगे मिलते हैं और धीरे-धीरे यह खेती कठिन होती जा रही है.

किसान अब छोड़ना चाहते हैं सिंघाड़े की खेती

आदर्श ने बताया कि “केवल जबलपुर में 1000 से ज्यादा किसान यह खेती कर रहे हैं और जिस तरीके से इसके दाम बढ़ रहे थे, उससे ऐसा लग रहा था कि इस सुपर फुट का भविष्य बहुत अच्छा है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब इसकी खेती करने वाले किसानों का भविष्य खतरे में है. यदि ऐसी ही स्थिति रही तो इस खेती को बंद करके मुझे भी कोई दूसरा काम करना होगा.”

दलदली क्षेत्र के लिए सबसे अच्छी फसल

भारत में कई ऐसे दलदली इलाके हैं, जहां पर साल भर पानी भरा रहता है. यहां दूसरी खेती करना बड़ा कठिन है, लेकिन सिंघाड़े की खेती आसानी से हो सकती है. जबलपुर के भी कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां पानी हमेशा बना रहता है. इसलिए यहां सदियों से किसान सिंघाड़े जैसी फसलों की खेती करते हैं.

मखाने की तरह प्रमोशन चाहता है सिंघाड़ा

जिस तरह का प्रमोशन सरकार ने मखाने की खेती के लिए किया है. कुछ इस तरह की ही प्रमोशन की जरूरत सिंघाड़े के लिए भी है. यदि सरकार सिंघाड़े के महत्व को प्रचारित-प्रसारित करती है, तो इसका फायदा न केवल आम आदमी को होगा, बल्कि इस काम में लगे हुए हजारों किसान भी फायदे में आ जाएंगे. गुजरात से आए व्यापारी राजेंद्र ने बताया कि “देश में कई जगह सिंघाड़ा होता है, लेकिन जबलपुर के सिंघाड़े की बात ही अलग है. इसीलिए भारी भाड़ा देने के बाद भी हम जबलपुर से सिंघाड़ा खरीद कर ले जाते हैं.”

सिंघाड़े की प्रोसेसिंग शुरू करने की मांग

सिंघाड़े की कई वैरायटी होती हैं. इनमें सबसे अच्छा सिंघाड़ा सुर्ख कलर का माना जाता है. इसकी मांग बड़े शहरों में बहुत अधिक होती है. सिंघाड़े पर बहुत अधिक शोध भी नहीं है. आदर्श, अशोक और राजीव का कहना है कि सरकार को इस विषय पर ध्यान देना चाहिए. यदि सिंघाड़े की प्रोसेसिंग शुरू हो जाए और सरकार यदि मदद करे, तो यह सुपर फूड भी कई लोगों को रोजगार दे सकता है. इसके निर्यात से भी सरकार को अच्छा खासा राजस्व प्राप्त हो सकता है.

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