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रिफॉर्म से ‘फॉर्म’ में आएगा भारत का कारोबार, कई राज्य करेंगे 23 बदलाव

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केंद्र के लेवल पर बीमे 11 बरसों में बिजनेस को आसान बनाने, मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने को लेकर कई रिफॉर्म हुए है. जिसका नतीजा ये है कि भारत ग्लोबल सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सेदार बन गया है. अब भारत रिफॉर्म के नेक्स्ट फेज में एंट्री लेने जा रहा है. इस फेज में भारत के राज्यों की बारी है. जो देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और बिजनेस को नई गति दे सकते हैं.

अब राज्य सरकारें केंद्र के दबाव में, पुराने लैंड यूज रूल्स को समाप्त कर रही हैं, जिनके तहत कारखानों को अपने 40 फीसदी भूखंड खाली रखने और 60 फुट चौड़ी सड़कों से सेवा प्रदान करने के लिए बाध्य किया जाता था. सरकारी निरीक्षकों द्वारा कंप्लायंस जांच को एक नई व्यवस्था के माध्यम से सीमित किया जा रहा है जो थर्थ पार्टी वेरिफिकेशन की अनुमति देती है.

ये सुधार, जिन्हें अधिकतर नियमों में बदलाव के माध्यम से लागू किया जा सकता है, कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन के नेतृत्व वाले एक टास्क फोर्स द्वारा चिन्हित किए गए हैं. एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने ईटी को बताया कि मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और त्रिपुरा इन उपायों को लागू करने में सबसे हैं. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर वो कौन से रिफॉर्म हैं, जिनपर कई राज्य सरकारें काम कर रही हैं.

23 प्रमुख सुधारों पर चल रहा काम

अधिकारी ने कहा देश में रिफॉर्म को लेकर काफी तेजी के साथ काम हो रहा है. उन्होंने कहा कि अधिकतर राज्यों की ओर से 50 फीसदी से ज्यादा कदम उठाए जा चुके हैं. अधिकारी ने कहा कि प्रत्येक राज्य ने इस प्रोसेस में 23 प्रमुख रिफॉर्म पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है, और कई राज्यों ने आगे बढ़ने की स्पष्ट इच्छा व्यक्त की है.

लागू किए गए उपायों में लेबर शेड्यूल्ड में बदलाव किए बिना दुकानों और प्रतिष्ठानों के लिए कार्य समय बढ़ाना, महिलाओं को खतरनाक उद्योगों या नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति देना, कारखानों को बंद करने की सीमा कम करना और मिक्स्ड यूज्ड डेवलपमेंट के लिए भूमि मानदंडों को आसान बनाना शामिल है. ऐसे रिफॉर्म की बदौलत मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के लिए भूमि की उपलब्धता बढ़ी है.

नई दिल्ली से इस ट्रांसफोर्मेशन को कैबिनेट सचिवालय के भीतर एक डीरेगुलेशन सेल संचालित कर रहा है, जो राज्यों के साथ प्रयासों का समन्वय कर रहा है और वास्तविक समय में प्रगति पर नज़र रख रहा है. जनवरी में जारी इकोनॉमिक सर्वे में पहली बार उजागर किए गए इन सुधारों का उद्देश्य भारत के इंवेस्टमेंट इकोसिस्टम के अंतिम पड़ाव को खोलना है.

केंद्र पहले ही कर चुका है कई रिफॉर्म

अधिकांश बड़े रिफॉर्म पहले ही केंद्रीय स्तर पर लागू किए जा चुके हैं, इसलिए अब ध्यान उन राज्यों पर केंद्रित हो गया है जहां ऑपरेशनल संबंधी समस्याएं सबसे ज़्यादा हैं. सर्वे में कहा गया था कि नियमों के कारण कंपनियों के सभी ऑपरेशनल संबंधी फैसलों की कॉस्ट बढ़ जाती है और उन प्रमुख सेक्टर्स की पहचान की गई जहां बिजनेस को आसान बनाने के लिए लक्षित कार्रवाई की आवश्यकता है.

उदाहरण के लिए, 5,000 वर्ग मीटर के प्लॉट वाले किसी भारतीय फैक्टरी मालिक को बिल्डिंग स्टैंडर्ड का पालन करने के लिए अपने प्लॉट का 69 फीसदी तक हिस्सा छोड़ना पड़ सकता है. इस खोई हुई जमीन की कीमत 1.58 करोड़ रुपए तक हो सकती है और इसका इस्तेमाल 509 अतिरिक्त नौकरियां पैदा करने के लिए किया जा सकता था.

राज्य इस पुराने और बेकार ज़मीन के उपयोग को दूर करने के लिए बदलाव लागू कर रहे हैं. अब कई क्षेत्रों को शामिल करते हुए नए रिफॉर्म्स की एक सीरीज तैयार की जा रही है. अधिकारी ने कहा कि अब तक उल्लेखनीय प्रगति हुई है. नेशनल लेवल पर भी एक समानांतर प्रयास चल रहा है. नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा के नेतृत्व में एक पैनल नॉन फाइनेंस रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को सरल बनाने के लिए केंद्रीय हस्तक्षेपों को अंतिम रूप दे रहा है—जो भारत में व्यापार सुगमता बढ़ाने के अभियान का अगला पड़ाव है.

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