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पेशवा की हत्या का गवाह ‘शनिवार वाडा’, अब नमाज़ विवाद से फिर चर्चा में, पुणे के ऐतिहासिक महल पर गरमाई सियासत

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महाराष्ट्र के पुण का शनिवार वाडा चर्चा में आ गया है. दरअसल, यहां पर कुछ मुस्लिम महिलाओं का नमाज अदा करने का वीडियो वायरल हो गया, जिसका काफी विरोध हुआ. इतना ही नहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) की राज्यसभा सांसद मेधा कुलकर्णी विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुईं और उस जगह का शुद्धिकरण भी किया. उन्होंने गौमूत्र छिड़क कर विरोध दर्ज कराया. विरोध-प्रदर्शन में कई हिंदू संगठन शामिल हुए. शनिवार वाडा एक ऐतिहासिक किला और महल है. मराठा साम्राज्य में इसका विशेष महत्व है.

यहां मुस्लिम महिलाओं द्वारा नमाज अदा करने का विरोध करते हुए मेधा कुलकर्णी ने कहा कि हिंदू भाइयों और बहनों ने शिव वंदना की, जिससे शनिवार वाडा की शुद्धि हुई. ऐतिहासिक शनिवार वाडा मराठा साम्राज्य के स्वर्णिम क्षणों का साक्षी है और यहां नमाज की घटना अत्यंत निंदनीय है. इसकी घटना की निंदा करने और पुणे के सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर समस्त हिंदू समुदाय ने विरोध प्रदर्शन किया.

वो कहती हैं कि शनिवार वाडा एक ऐतिहासिक स्थल है. अटक से कटक तक हुए मराठा साम्राज्य के विस्तार का संचालन इस ऐतिहासिक स्थल से हुआ. ये हमारी विजय का प्रतीक है. यदि लोग यहां आकर नमाज अदा करते हैं तो हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे. भविष्य में ऐसी घटना फिर न हो इसके लिए हिंदुओं को एकजुट होने की आवश्यकता है. इसके साथ ही हिंदू संस्कृति, हिंदू परंपराओं और हिंदुओं के गौरवशाली इतिहास को संरक्षित करना हमारा कर्तव्य है.

क्या है शनिवार वाडा का इतिहास

पेशवा बाजीराव प्रथम ने 1732 में शनिवार वाडा का निर्माण कराया था. इसका शिलान्यास शनिवार के दिन हुआ इसलिए इसका नाम शनिवार वाडा पड़ गया. ये एक विशाल किला था, जिसमें 5 मुख्य दरवाजे और 9 टावर थे. ये लकड़ी और पत्थर दोनों से बना था. 1828 में यहां भीषण आग लग गई, जिसमें अधिकांश हिस्सा नष्ट हो गया. आज सिर्फ पत्थरों की दीवारें और गेट ही बचे हैं. ये 13 मंजिला महल था.

शनिवार वाडा अब पर्यटन स्थल है और भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) द्वारा संरक्षित है. यहां हर शाम लाइट एंड साउंड शो भी होता है. ये वाडा पेशवा शासन का राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र बना. यहीं से मराठा साम्राज्य के प्रशासन, युद्ध नीति और कूटनीति के निर्णय लिए जाते थे. बाजीराव प्रथम, नाना साहेब, माधवराव प्रथम, नारायणराव, माधवराव द्वितीय सभी पेशवाओं ने यहीं से शासन किया.

सन 1818 में अंग्रेजों ने शनिवार वाडा पर अपना नियंत्रण कर लिया. इसके बाद 1828 में यहां भीषण आग लग गई, जो कई दिनों तक जलती रही.

17 साल के नारायणराव की हत्या

1773 में यहां पेशवा नारायणराव की हत्या कर दी गई थी. उस समय वो सिर्फ 17 साल के थे. नारायणराव के हत्या की साजिश में उनके काका रघुनाथराव और काकी आनंदीबाई शामिल थीं. नारायणराव की हत्या के समय रघुनाथराव गद्दी के अगले दावेदार थे. उन्हें उम्मीद थी कि पेशवा की गद्दी उन्हें मिलेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नारायणराव को पेशवा चुन लिया गया. नारायणराव बालाजी बाजीराव के बेटे थे, जिन्हें नाना साहेब पेशवा भी कहा जाता था. 1772 में बड़े भाई माधवराव प्रथम ने निधन के बाद नारायणराव 16 साल की उम्र में पेशवा बन गए.

इसे लेकर काफी षड्यंत्र और सत्ता संघर्ष बढ़ने लगा. नारायणराव ने अपने काका को नजरबंद भी रखा ताकि उन पर काबू रखा जा सके. कहा जाता है कि रघुनाथराव ने नारायणराव को कैद करने का आदेश दिया था, जिसे आनंदीबाई ने बदल दिया. पत्र में धरा (पकड़ो) को मारा (मारो) कर दिया. इसके बाद ही नारायणराव की हत्या कर दी गई. हत्या के समय वो काका, मला वाचवा (काका, मुझे बचाओ) चिल्ला रहे थे. नारायणराव के साथ उनके सेवक चापाजी तिलेकर भी मारे गए. कुल 11 लोगों की हत्या हुई थी.

इसी हत्याकांड को लेकर कहा जाता है कि आज भी वहां रात को काका, मला वाचवा की आवाज गूंजती है. इसी को लेकर इसे भूतिया जगह भी कहा जाता है. रात में यहां लोगों के प्रवेश पर रोक है.

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