Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
महाशिवरात्रि पर श्री हनुमान बालाजी मंदिर में कार्यक्रम, सनातनी विनोद बिंदल बोले – महादेव सबका कल्याण... Tiger-Leopard Death Toll: खेतों में बिछे 'मौत के तार', करंट लगने से गई जान, 10 साल के आंकड़ों ने चौं... T20 World Cup Lowest Strike Rate: सबसे धीमी बल्लेबाजी का रिकॉर्ड, लिस्ट में पाकिस्तान के 3 खिलाड़ी Akshay Kumar Viral Video: '1 करोड़ क्या, किडनी भी दे दूंगा...', अक्षय ने RJ महविश से क्यों कही ये बा... Israel-Jordan Tension: फिलिस्तीन के बाद अब जॉर्डन की बारी? इजराइल के रडार पर क्यों है अम्मान, जानें ... 8th Pay Commission Fraud: सरकारी कर्मचारी सावधान! एक क्लिक और खाली हो जाएगा बैंक खाता, जानें नया स्क... What is Data Center: क्या है डाटा सेंटर? जिस पर अडानी-अंबानी लगा रहे अरबों, जानें कमाई का पूरा गणित Ramadan 2026 Moon Sighting: सऊदी अरब में दिखा चांद, जानिए भारत में कब रखा जाएगा पहला रोजा? Gut Health: आंतों की सफाई के लिए सुबह उठते ही करें ये 1 काम, पेट की सारी गंदगी हो जाएगी बाहर Shivpal Yadav on Brajesh Pathak: 'चोटी विवाद' पर डिप्टी सीएम को घेरा, बोले- पाप के भागी आप भी होंगे

जीतने की गारंटी या राजनीतिक मजबूरी? दलों ने क्यों काटा मुस्लिम नेताओं का टिकट, क्या ध्रुवीकरण है वजह?

9

बिहार में चुनाव को लेकर पहले चरण की नामांकन दाखिल करने की मियाद खत्म हो गई है. लेकिन पहले चरण के चुनाव के लिए प्रतिष्ठित पार्टियों से प्रत्याशियों का ऐलान किया गया, उसमें मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या बहुत ही कम है. राज्य की आबादी में मुसलमानों की कुल हिस्सेदारी करीब 17.7% है, जबकि उत्तरी सीमावर्ती जिलों में यह संख्या बढ़कर 40% से भी ज्यादा हो गई है, लेकिन विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की उम्मीदवारों की लिस्ट में मुस्लिम नाम बड़ी मुश्किल से दिखाई पड़ रहे हैं. अभी तक, किसी भी राजनीतिक दल ने राज्य के 243 विधानसभा सीटों के लिए 4 से ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है. हालांकि प्रशांत किशोर की नवगठित जन सुराज पार्टी ने चुनाव में 40 मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में उतारने का वादा किया है और अब तक 21 का ऐलान कर चुकी है.

यह सब कुछ तब हो रहा है जब 87 निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से अधिक है, जिससे उनके वोट किसी भी उम्मीदवार के चुनावी भाग्य में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. हालांकि, राज्य के करीब 75% मुसलमान उत्तरी बिहार में रहते हैं. पिछले कुछ सालों में, सीमांचल या सीमावर्ती जिलों कटिहार, पूर्णिया और अररिया में मुस्लिम समाज की आबादी 40 फीसदी तक बढ़ गई है, जबकि किशनगंज जिले में मुसलमान बहुसंख्यक हो गए हैं, और इनकी संख्या हिंदुओं से भी अधिक है और वहां की कुल आबादी का 68% से ज्यादा हिस्सा है.

JDU-RJD ने भी दिखाई कंजूसी

बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड इस बार 101 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, ने अब तक सिर्फ 4 मुस्लिम प्रत्याशियों को ही टिकट दिया है. जबकि विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल ने अभी तक अपने उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी नहीं की है, लेकिन उसने अब तक महज 3 मुसलमानों (पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा साहब, रघुनाथपुर निर्वाचन क्षेत्र से; यूसुफ सलाहुद्दीन (सिमरी-बख्तियारपुर सीट से); और मोहम्मद इसराइल मंसूरी (कांटी सीट से) को टिकट दिया है.

राष्ट्रीय दल भी मुस्लिमों से बेपरवाह

राष्ट्रीय दलों की बात करें तो बीजेपी जिन 101 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, उनमें से किसी पर भी उसने कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है, जबकि दूसरी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस, जिसने अभी तक आधिकारिक तौर पर यह ऐलान नहीं किया है कि वह कुल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ रही है, ने अब तक महज 4 मुस्लिम उम्मीदवारों की घोषणा की है. हालांकि पार्टी में शामिल कुछ मुस्लिम नेता सवाल उठा रहे हैं कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी का आनुपातिक प्रतिनिधित्व का आह्वान यहां क्यों लागू नहीं हो रहा.

अन्य छोटी पार्टियों की बात करें तो लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास पासवान) सत्तारूढ़ एनडीए के हिस्से के रूप में 29 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. उसकी ओर से एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार, मोहम्मद कलीमुद्दीन को मैदान में उतारा गया है. कलीमुद्दीन पूर्वोत्तर बिहार की बहादुरगंज सीट से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

एनडीए के अन्य दो सहयोगी दलों, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेकुलर) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा, राज्य में 6-6 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं और ये दोनों भी किसी मुसलमान को टिकट नहीं दे रहे हैं. चुनाव रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी अब तक 116 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी है, जिनमें से 21 मुसलमान हैं.

मुस्लिम बिरादरी को कम प्रतिनिधित्व

ऐतिहासिक रूप से, बिहार के मुसलमानों को लंबे समय से चुनावी प्रतिनिधित्व में लगातार कमी का सामना करना पड़ा है. राज्य विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 1985 को छोड़कर, कभी भी 10% से अधिक नहीं रही है. हालांकि राज्य को एक मुस्लिम मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के रूप में मिल चुका है. गफूर 1970 के दशक में दो साल से भी कम समय के लिए राज्य के मुख्यमंत्री पद पर रहे. जबकि उपमुख्यमंत्री के पद पर बिहार में एक भी मुस्लिम नेता नहीं पहुंच सका. हालांकि गुलाम सरवर और जाबिर हुसैन क्रमशः विधानसभा अध्यक्ष और विधानपरिषद के सभापति के पद पर रहे. कुछ मुस्लिम नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी, शकील अहमद, मोहम्मद तस्लीमुद्दीन और मोहम्मद ज़मा खान जैसे कुछ मुस्लिम नेता कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं.

साल 1952 से 2020 के बीच हुए 17 विधानसभा चुनावों में, बिहार ने कुल 390 मुस्लिम विधायक चुने हैं, जो अब तक चुने गए कुल विधायकों का महज 7.8% ही है. 1985 में सबसे ज्यादा मुस्लिम विधायक तब चुने गए थे, जब बिहार अविभाजित था और उस समय 324 सदस्यीय विधानसभा थी. तब 34 मुस्लिम विधायक बने थे. 2020 के विधानसभा चुनाव में, 243 सीटों वाली विधानसभा में महज 19 मुस्लिम ही चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे.

बिहार में निर्वाचन प्रतिनिधित्व के मामले में गरीब और वंचित पसमांदा मुसलमानों की स्थिति और भी खराब है. राज्य के 2.3 करोड़ मुसलमानों में 73% पसमांदा समुदाय के होने के बावजूद, अब तक महज 18% मुस्लिम विधायक पसमांदा रहे हैं. साल 2020 में, सिर्फ 5 पसमांदा विधायक थे, जिनमें से 4 ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) से और एक राष्ट्रीय जनता दल से जुड़ा हुआ था.

वोटबैंक में तेजी से होता गया बदलाव

पिछले विधानसभा चुनाव में भी मुस्लिम उम्मीदवार खास कामयाब नहीं हो सके थे. जेडीयू के 11 मुस्लिम उम्मीदवार थे, लेकिन सभी चुनाव हार गए. इसी तरह आरजेडी ने 17 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे और उनमें से महज 8 ही जीत सके. कांग्रेस की ओर से 10 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में थे और 4 ही जीत पाए. ओवैसी की एआईएमआईएम ने 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 5 ही जीते, इसमें भी 4 विधायक साल 2022 में राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हो गए. दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी के एकमात्र मुस्लिम विधायक ने भी आगे चलकर जेडीयू का दामन थाम लिया.

आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव दावा करते थे कि उनकी पार्टी की चुनावी सफलता की कुंजी संयुक्त ‘MY’ वोट बैंक है, जो कुल वोटर्स का 31% (जिसमें 17% मुस्लिम आबादी और 14% यादव जाति के लोग शामिल हैं) है, जिसकी वजह से वे 1990 से 2005 तक सत्ता में रहे. हालांकि, उनकी जीत का यह सेट फॉर्मूला तब ध्वस्त हो गया जब जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार ने अत्यंत पिछड़े वर्गों (36%) को मिलाकर एक नया वोट बैंक बना लिया और पिछले दो दशकों में अधिकांश समय तक सत्ता जीतने और उसे बनाए रखने के लिए जातिगत गणित का इस्तेमाल किया.

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.