जीतने की गारंटी या राजनीतिक मजबूरी? दलों ने क्यों काटा मुस्लिम नेताओं का टिकट, क्या ध्रुवीकरण है वजह?
बिहार में चुनाव को लेकर पहले चरण की नामांकन दाखिल करने की मियाद खत्म हो गई है. लेकिन पहले चरण के चुनाव के लिए प्रतिष्ठित पार्टियों से प्रत्याशियों का ऐलान किया गया, उसमें मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या बहुत ही कम है. राज्य की आबादी में मुसलमानों की कुल हिस्सेदारी करीब 17.7% है, जबकि उत्तरी सीमावर्ती जिलों में यह संख्या बढ़कर 40% से भी ज्यादा हो गई है, लेकिन विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की उम्मीदवारों की लिस्ट में मुस्लिम नाम बड़ी मुश्किल से दिखाई पड़ रहे हैं. अभी तक, किसी भी राजनीतिक दल ने राज्य के 243 विधानसभा सीटों के लिए 4 से ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है. हालांकि प्रशांत किशोर की नवगठित जन सुराज पार्टी ने चुनाव में 40 मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में उतारने का वादा किया है और अब तक 21 का ऐलान कर चुकी है.
यह सब कुछ तब हो रहा है जब 87 निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से अधिक है, जिससे उनके वोट किसी भी उम्मीदवार के चुनावी भाग्य में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. हालांकि, राज्य के करीब 75% मुसलमान उत्तरी बिहार में रहते हैं. पिछले कुछ सालों में, सीमांचल या सीमावर्ती जिलों कटिहार, पूर्णिया और अररिया में मुस्लिम समाज की आबादी 40 फीसदी तक बढ़ गई है, जबकि किशनगंज जिले में मुसलमान बहुसंख्यक हो गए हैं, और इनकी संख्या हिंदुओं से भी अधिक है और वहां की कुल आबादी का 68% से ज्यादा हिस्सा है.
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