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इंदौर के संग्रहालय ने सहेजा भारत का इतिहास, सिंधु घाटी सभ्‍यता के अवशेष से लेकर होलकर वंश तक के सिक्के हैं मौजूद

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इंदौर। करीब 90 साल पुराने केंद्रीय संग्रहालय का अब कद बढ़ने जा रहा है। इतिहास की गवाही देता यह संग्रहालय अब आधुनिक तकनीक से लेस होगा। दरअसल संग्रहालय के कायाकल्प के लिए डीपीआर तैयार की गई है। जिसमें 6 करोड़ रुपये से संग्रहालय को नया स्वरूप दिया जाएगा। जहां इतिहास सहेजने के नई मंजिल बनाई जाएगी, वहीं ऑडिटोरियम भी तैयार किया जाएगा। दर्शकों के लिए लिफ्ट भी लगाई जाएगी।

इंदौर में केंद्रीय संग्रहालय की स्थापना 29 नवंबर 1923 को नवरत्न मंदिर के रूप में हुई थी। फिर 1 अक्टूबर 1929 को कृष्णपुरा स्थित देवलालीकर कला वीथिका भवन में यह संग्रहालय प्रारंभ हुआ। वर्ष 1930 में यहां दसवीं सदी की प्रतिमाएं, प्रस्तर अभिलेख, ताम्रपत्र आदि प्रदर्शित किए गए थे। कुछ समय बाद एबी रोड पर बने नवीन भवन में स्थानांतरित कर दिया गया, जो वर्तमान केंद्रीय संग्रहालय है।

इस संग्रहालय में पुरावशेष, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष, हिंगलाजगढ़ की परमार कालीन प्रतिमाएं आदि से लेकर मुद्रा प्रचलन व होलकर कालीन मुद्राएं प्रदर्शित हैं। वर्तमान में यहां छोटी-बड़ी कुल 350 मूर्तियां प्रदर्शित की जा रही हैं।

 

थ्रीडी में दिखेगा इतिहास

 

जानकारी के अनुसार कुछ माह पहले पुरातत्व विभाग ने केंद्रीय संग्रहालय के कायाकल्प के लिए 6 करोड़ रुपये की डीपीआर तैयार की है। वर्तमान में डीपीआर स्वीकृति के लिए मुख्यालय भेजी गई है। आचार संहिता के चलते अब तक स्वीकृति नहीं मिली है। डीपीआर के अनुसार केंद्रीय संग्रहालय में एक मंजिल ओर खड़ी की जाएगी। जहां पर दो नई गैलरी बनाई जाएगी। दर्शकों के लिए दो लिफ्ट लगाई जाएगी। ग्राउंड फ्लोर पर एक एडिटोरियल बनाया जाएगा, जिसमें इतिहास से जुड़े व्याख्यान, कार्यशाला आदि आयोजित किए जाएंगे। मूर्तियों के डिस्प्ले लाइटिंग बदलने जाएंगे। जिसमें लाइटिंग सिर्फ मूर्ति पर ही रहेगी, इससे मूर्ति आकर्षक दिखेगी। इसके साथ हर एक मूर्ति और अन्य के पास थ्रीडी डिस्पले भी लगेगी, जिसमें इतिहास की जानकारी दी जाएगी।

पुरातत्व विभाग के उपसंचालक प्रकाश ने बताया कि संग्रहालय के आधुनिकीकरण का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। तीसरी शताब्दी की मां सरस्वती प्रतिमा संग्रहालय की मूर्तिकला वीथिका राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान रखती है। इनमें तीसरी-चौथी शताब्दी की मां सरस्वती की प्रतिमा, सातवीं-आठवीं शताब्दी की शिव के अवतार माने जाने वाले भगवान लकुलीश, हिंगलाजगढ़ से प्राप्त बरेश्वर व कार्तिकेय, भानपुरा से प्राप्त उमा-महेश्वर आदि की मूर्तियां हैं। इसी तरह वैष्णव सम्प्रदाय की विष्णु, वामन, लक्ष्मीनारायण, शेषशायी विष्णु, सूर्य की स्थानक प्रतिमा, गणेश, सप्त मातृकाएं, महिषासुरमर्दिनी आदि प्रतिमाएं हैं।

संग्रहालय में प्राचीन सिक्कों का भी संग्रह है। जिसमें प्राचीन एवं मध्यकाल के सिक्के बड़ी संख्या में संग्रहित हैं। यहां 800 मूर्तियां तो ऐसी हैं, जिन पर अब भी पर्दा डला हुआ है।

 

हस्तलिखित ग्रंथ में छिपा इतिहास

 

संग्रहालय में बड़ी संख्या में हस्तलिखित ग्रंथ में सुरक्षित रखे गए है। जिसमें ज्ञानेश्वरी, बघेलखंड का इतिहास, पिंगल काव्य विभूषण, रामचंद्रिका, लाल चंद्रिका, गणेश गीता, प्राकृत ग्रंथ, रामसखे जू की दोहावली, केशवदास कृत रामचंद्रिका, चित्रगुप्त की कथा, राजवंश सूची, सुधारस टीका आदि है।

 

दर्शकों के लिए तैयार लालबाग पैलेस

 

अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर केंद्रीय संग्रहालय, राजवाड़ा और लालबाग मुफ्त रहेगा। इस खास दिन के लिए लालबाग पैलेस की साफ-सफाई पिछले सप्ताहभर से चल रही थी। इस पैलेस में होलकर शासक अपने शासनकाल के अंतिम दौर में रहे। तुकोजीराव तृतीय द्वारा पूर्ण कराए गए इस भवन में 1978 तक राज परिवार का वास रहा और बाद में यह संग्रहालय में तब्दील हो गया। यहां के कालीन, सोफे के कपड़े, पर्दे समय के साथ तार-तार हो गए और दीवारों के साथ यहां की गई यूरोपियन शैली की चित्रों की चमक धूमिल हाे गई थी। दो वर्ष पहले ही विभाग द्वारा इसे नए सिरे से तैयार किया गया है। जिससे पूरानी रंगत लौट आई है। यहां का क्राउन हाॅल, सिटिंग रूम, वेस्टर्न डाइनिंग रूम और महाराजा ऑफिस फिर अपने वैभव की गवाही देने लगे हैं।

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