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BJP के लिए नाक की लड़ाई, अखिलेश-मायावती के लिए मौका… यूपी के महाभारत में पीलीभीत ऐसे बना कुरुक्षेत्र

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पीलीभीत सीट से रुहेलखंड की कई सीटों तक संदेश जाता है, शायद यही वजह है कि इस सीट पर सियासी दिग्गजों की एंट्री हो चुकी है. 2 अप्रैल को सीएम योगी ने प्रचार किया तो पीएम मोदी ने विरोधियों पर विशाल रैली के जरिए वार किया तो अब अखिलेश यादव पीलीभीत के रण में प्रचार करते हुए दिखाई देंगे. मेनका-वरुण फैक्टर इस सीट पर अहम रहा है तो उम्मीदवार बदले जाने से विपक्ष को उम्मीद जागी है. यूपी की महाभारत में पीलीभीत कुरुक्षेत्र बनता हुआ दिखाई दे रहा है. पीलीभीत की तराई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी हुंकार के बाद सपा-बसपा भी ताव में आ गई हैं.

पहले चरण के चुनाव में समाजवादी प्रचार को धार देने जहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव अब मैदान में उतर रहे हैं तो बसपा सुप्रीम मायावती भी पीलीभीत में हाथी की रफ्तार बढ़ाने आ रही हैं. अखिलेश और मायावती की पीलीभीत में चुनावी रैलियों के बीच भाजपा ने भी तराई में प्रचार की आधी कम नहीं होने देने की ठान ली है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फिर पीलीभीत में धुआंधार प्रचार के मिशन पर लगा दिया है. पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र में 12 अप्रैल को सपा प्रमुख अखिलेश यादव, 13 अप्रैल को सीएम योगी और 15 अप्रैल को मायावती क्रमशः पूरनपुर, बहेड़ी और बीसलपुर में चुनावी प्रचार और एक-दूसरे पर प्रहार करते दिखाई देंगे.

पीलीभीत के एक तरफ उत्तराखंड और दूसरी तरफ नेपाल है. इसके करीब बरेली, शाहजहांपुर और लखीमपुर खीरी आती है. पीलीभीत वरुण गांधी और मेनका गांधी की सियासी सियासत को आगे बढ़ाने वाली सीट है. लगातार मेनका गांधी यहां से सांसद रही हैं और 2019 तक वरुण गांधी यहां के सांसद रहे थे, लेकिन इस बार बीजेपी ने यहां से यूपी सरकार के मंत्री जितिन प्रसाद को टिकट दिया है जोकि यूपी पीडब्ल्यूडी मंत्री हैं.

टिकट देने के पीछे का गणित

बीजेपी ने इस बार यहां से वरुण गांधी का टिकट काटकर जितिन प्रसाद को प्रत्याशी बनाया है. जितिन प्रसाद पहले 2022 से पहले तक कांग्रेस में थे. 2022 के विधानसभा जब चुनाव हुए तो कांग्रेस छोड़कर वो भाजपा में आ गए. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जितेंद्र प्रसाद के वो पुत्र रहे हैं, वह कांग्रेस का ब्राह्मण चेहरा माने जाते थे और अब बीजेपी में पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर है. बतौर पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर रहते हुए जब वह उनका टिकट फाइनल हुआ और व पीलीभीत पहुंचे और उन्होंने कहा कि यहां की सड़कों को भी हम बहुत बेहतर कर देंगे. पूरनपुर के पास प्रसादपुर गांव में इनका फॉर्म हाउस भी है, इसलिए यहां के लोग इनको बहारी नहीं मानते हैं. सपा ने भगवती शरण गंगवार को टिकट दिया है, जोकि सपा सरकार में मंत्री भी रहे हैं और बरेली के नवाबगंज से कई बार विधायक रहे हैं. वहीं बसपा ने यहां से अनीश अहमद उर्फ फूल बाबू को प्रत्याशी बनाया है.

अनीश अहमद उर्फ फूल बाबू को टिकट देने के पीछे बसपा का गणित यह है कि यहां पर करीब 5 लाख के आसपास मुस्लिम वोटर है. इसलिए यहां पर सपा को जो फायदा हो सकता था, वो बसपा के प्रत्याशी उतारने के बाद कुछ हद तक कम होगा. बसपा प्रत्याशी अनीश का यहां पर अच्छा दबदबा माना जाता है. वह 1998 से लेकर 2014 तक इस सीट पर चुनाव लड़े हैं, भले ही उन्हें जीत का स्वाद चखने को नहीं मिला. यहां पर पिछले चुनाव में वरुण गांधी चुनाव लड़े थे और उनको 7 लाख 4 हजार वोट मिले थे, जबकि सपा के हेमराज वर्मा को 4 लाख 48 हजार के आसपास वोट मिले थे. 2019 में हार-जीत का अंतर 2 लाख से ज्यादा था.

पीलीभीत में कुर्मी मतदाताओं की तादाद भी काफी अच्छी है और सपा ने भगवती शरण गंगवार कुर्मी मतदाता को मैदान में उतारा है. ऐसे में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि समाजवादी पार्टी को 70 से लेकर 80 प्रतिशत कुर्मी वोट मिलेगा. वहीं बसपा के प्रत्याशी को भी 100% वोट नहीं मिलेगा. इसके बाद वाल्मीकि और पासी समाज भारतीय जनता पार्टी के साथ है जबकि जाटव समाज बसपा के साथ है. रैली में कल्याण को याद कराकर लोधी समाज को नरेंद्र मोदी ने फिर से एकजुट करने का प्रयास किया है, जिसके बाद यह कहा जा सकता है कि इस चुनाव में लोधी राजपूत वोट बीजेपी के पाले में जाएगा. दूसरी तरफ बंगाली समुदाय हमेशा से भारतीय जनता पार्टी के साथ रहा है. इसलिए इस सीट पर कांटे की टक्कर कही जा सकती है.

मेनका-वरुण का कितना दबदबा

मेनका गांधी और वरुण गांधी के जीतने का एकमात्र कारण यह था कि 1989 से पूर्व यहां का सांसद, यहां का विधायक यहां, यहां जिला पंचायत अध्यक्ष, यहां का नगर पालिकाओं के अध्यक्ष सभी कुर्मी जाति के होते थे. 1989 में जब मेनका गांधी यहां से चुनाव लड़ी तो कुर्मी वोटर्स को एकजुट करने में सफल रही और यही कारण रहा है कि मेनका गांधी और वरुण गांधी पिछले 35 साल से यहां के सांसद चुने गए. जानकारों की मानें तो मेनका गांधी या वरुण गांधी अपने लिए वोट तो ले सकते हैं, लेकिन किसी को वोट नहीं दिला सकते. इसके पीछे उदाहरण है कि पिछले नगरपालिका चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से अलग वरुण गांधी ने अपने प्रत्याशी लड़ाए थे, लेकिन सबकी जमानत जब्त हो गई थी. मेनका गांधी ने शक्ति दल बनाकर यहां से भाजपा के खिलाफ प्रत्याशी उतारे थे और एक को भी 5000 से ऊपर वोट नहीं मिल पाए थे.

हालांकि कोरोना काल में वरुण गांधी एकमात्र ऐसे सांसद थे, जिन्होंने पीलीभीत में ऑक्सीजन की सप्लाई की और लगातार कई महीनों तक सांसद रसोई चलाई. उन्होंने यहां पर किसी को भूखा नहीं रहने दिया, लेकिन पिछले तीन साल से लगातार वह पार्टी को कटघरे में खड़ा कर रहे तो उनको इसका परिणाम भुगतना पड़ा. वैसे पिछले दिनों चौधरी भूपेंद्र सिंह ने कहा कि वरुण गांधी का सही समय पर उपयोग किया जाएगा.

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