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रामलला प्रतिष्‍ठा से पहले इंदौर में भी अयोध्‍या जैसा माहौल, रामभक्‍तों का उल्लास छू रहा आसमान

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इंदौर। इंदौर जबसे अपने अस्तित्व में आया है, तबसे इतना अधीर, इतना व्याकुल, इतना उल्लसित और इतना प्रतीक्षित कभी नहीं दिखा, जितना इन दिनों दिखाई दे रहा है। हर चेहरे पर एक ताजा उल्लास है और हर मन में प्रभु दरसन की आस। इन दिनों इस नगर के रोम-रोम में श्रीराम के स्वागत की प्रतीक्षा झलक रही है। यहां की गलियां अब रामधुन में गुम्फित होकर अहर्निश गूंज रही हैं, मोहल्ले अब मर्यादा पुरुषोत्तम के स्वागत में मनहर हो गए हैं, हर सड़क जैसे रामपथ बन गई है, हर बजरिया जैसे बाजों-गाजों पर नृत्यांजलि के लिए आतुर हैं।

मंदिरों और मठों का तो खैर कहना ही क्या। वे न जाने कितनी सदियों बाद अब एक अनूठे आत्मविश्वास और आत्मबल से भरे हुए हैं। वे अब अपने शिखर को और उत्तुंग तथा मंडपम को और भव्य पा रहे हैं। उनके शिखर पर सुसज्जित होकर लहर-लहर लहरा रहीं धर्म-ध्वजाएं जयघोष कर रही हैं। वे अब आकाश हो जाना चाहती हैं। मंदिरों की नींव के पत्थर तक बोल रहे हैं कि एक बार हम भी बाहर आकर रामलला के दर्शन कर लें, फिर वापस भूमि की गोद में सदा के लिए अवस्थित हो जावेंगे। इंदौर के हर कंठ से अब बस यहीं गूंज रहा है…

अर्थात हे प्रभु, हे संपूर्ण लोकों में सुंदर नाथ, हे रणक्रीड़ा में धीर-गहन गंभीर, हे कमल नयन, हे रघुवंश के उदात्त नायक, हे करुणा की प्रतिमूर्ति हम सभी आप श्री की शरण में हैं भगवन।
यूं तो भारत के मंदिरों में श्रीराम के भजन सदियों से गाए-गुनगुनाए जा रहे हैं। कहीं कीर्तन मंडलियां अपने लोक-कंठ से श्रीराम के गुण गाती रही हैं, तो कहीं संत-प्रवर अपने श्रीमुख से शास्त्रीय मंत्रों का पाठ करते रहे हैं। किंतु इन दिनों एक अभूतपूर्व बदलाव यह दिख रहा है कि जन-जन का हर कंठ मानो कीर्तन मंडली हो गया है, हर श्वास जैसे साधु हो गई है। अब हर मन में भक्तिभाव से भरा यही भजन अहर्निश चल रहा है-
राम रमैया गाए जा,
राम से लगन लगाए जा।
राम ही तारे, राम उबारे,
राम-राम दोहराए जा।।
मन अब मंदिर हो गया, देह भई गल-माल
चाहे केरल के समुद्री तट पर बसा कोई छोटा-सा गांव हो या कश्मीर में शीत से ठिठुर रहा कोई शिकारा, चाहे पंजाब का कोई पिंड हो या राजस्थान की कोई ढाणी, चाहे अरुणाचल प्रदेश में सूर्योदय देखती कोई उत्तुंग पहाड़ी हो या मध्य प्रदेश में शाम के सूर्य को अपनी गोद में समा लेने वालीं मां नर्मदा… ये सब भी अब राममय हैं। इंदौर भी अब समूचे भारत के इसी भाव में रंग गया है। यहां की प्रत्येक रज-कण में से राम-राम की रामधुन निकल रही है। यहां के प्रत्येक जन का मन अब मानो मंदिर हो गया है और देह अब प्रभु श्रीराम के गले में डलने वाली गल-माल हो गई है।
यूं इंदौरी जन बहुत उत्सवधर्मी हैं। एक छोटी-सी साइकिल खरीदने पर भी ऐसा उल्लास मनाते हैं कि मोहल्ला गुंजा देते हैं। क्रिकेट मैच में भारत की जीत हो तो राजवाड़ा पर एकत्रित हो जाते हैं। किंतु इस बार इंदौर का उछाह इन सबसे अलग और पवित्र है। उल्लास के अन्य मौकों पर इंदौर मस्ती में डूबता है, खाने-पीने में लग जाता है या हल्की-सी उद्दंडता भी कर बैठता है। किंतु इस बार श्रीराम के आने पर जो उल्लास है, वह पवित्र है, आनंदमय है, मंगल है और पुंडरीक जैसा धवल है। इस बार के उत्सव में अनूठी गहराई है। कोई मस्ती या उद्दंडता का भाव नहीं। किसी का मन नहीं कि श्रीराम के आगमन का उल्लास सराफा चौपाटी जाकर कुछ खा-पीकर मनाया जाए। इस बार तो सबका मन उपवास करने के संकल्प ले रहा है। मोहल्लों से लेकर पाश मल्टियाें तक और सुकड़ी-मुकड़ी गलियों से लेकर चमचमाते शापिंग माल तक… सब जगह भगवा लहरा रहा है, उजास किया गया है और सबके मन में एकरूपता है। इंदौर को इससे पहले किसी एक उत्सव में ऐसा एकमेक और कोई न कर सका है। यह प्रभु श्रीराम की ही कृपा है। सब अपनी-अपनी समझ-बूझ से श्रीराम का नाप जप रहे हैं, ज्यों अब सब वाल्मीकि हो जाना चाहते हैं, क्योंकि सब जानते हैं कि…
उलटा नाम जपत जग जाना,
वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना।।

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