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जब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सीनेट हॉल में मुनव्वर राणा को सुनने के बाद रोने लगे थे लोग

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कोई 24-25 बरस पहले की बात है, मैं इलाहाबाद के एक अखबार में नौकरी करता था. बड़े भाई और हमारे ब्यूरो चीफ प्रताप सोमवंशी जी ने एक रोज दोपहर में कहा- चलो तुम्हें मुनव्वर भाई से मिलाकर लाते हैं. प्रताप जी की बाइक से हम होटल रैगिना पहुंचे. इसके बाद अगले एक डेढ़ घंटे शेरो शायरी का ही दौर चलता रहा. मुनव्वर भाई को इस तरह करीब से सुनने का ये पहला मौका था. यूं भी साहित्य कभी भी मेरा विषय नहीं रहा. प्रख्यात साहित्यकार रवींद्र कालिया और ममता कालिया जी के यहां बहुत आना-जाना था. उनका घर मेरे लिए किताबों के ‘म्यूजियम’ जैसा था. वहीं जाकर अदब की दुनिया से रिश्ता शुरू हुआ था. लिहाजा मुनव्वर भाई का नाम तो सुना था लेकिन उन्हें पढ़ा नहीं था.

किस्मत देखिए कि किताबों के जरिए मुनव्वर भाई को जानने की बजाए पहली ही बार में उन्हें ‘लाइव’ सुना. वो पहला मौका था जब मैंने किसी शायर को इस तरह बिल्कुल आमने-सामने सुना था. इसके बाद मुनव्वर भाई को खूब पढ़ा, खूब सुना, फोन पर बातचीत होती रही, कई मुलाकातें हुईं लेकिन आज मुनव्वर भाई के ना रहने पर उनसे वो पहली मुलाकात दिमाग में बार-बार घूम रही है.

असल में वो ‘गूगल बाबा’ का जमाना नहीं था. किसी लेखक या शायर को समझना हो तो उसका माध्यम किताबें ही थीं. प्रताप भाई से किताब ली और एक दिन में ही पढ़ गया. वो किताब थी- गजल गांव। मुनव्वर भाई की शुरूआती किताबों में से एक. ये भी पता चला कि होटल रैगिना मुनव्वर भाई का ‘अड्डा’ है.वो शहर के किसी भी नामी-गिरामी होटल में रूक सकते हैं लेकिन उन्हें उस होटल से लगाव था. मुनव्वर भाई का ही वो शेर याद आ रहा है.

”तुम ही नवाजते तो क्यों इधर-उधर जाते

तुम्हारे पास ही रहते क्यों छोड़कर जाते”

किसी के नाम से मंसूब ये इमारत थी

बदन सराय नहीं था कि सब ठहर जाते”

जब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के मुशायरे में छाए मुनव्वर राणा

मुनव्वर भाई से मुलाकात के कुछ ही दिनों बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एक मुशायरा था. इस मुशायरे में तमाम बड़े शायर आए थे. मुनव्वर भाई भी शामिल हुए थे. गीतकार नीरज, राहत इंदौरी जैसे बड़े नाम भी उस मुशायरे का हिस्सा थे.विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में मुनव्वर भाई ने महफिल लूट ली. उनके हर एक शेर पर तालियां बज रही थीं. उस रोज उन्होंने कुछ आंखों को नम भी किया. ‘मां’ पर लिखे गए शेरों के बाद उन्होंने उस रोज सुनाया था.

”बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है,

न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है”

मुनव्वर मां के आगे यूं कभी खुल कर नहीं रोना

जहां बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती”

उस रोज राहत इंदौरी ने भी कमाल का माहौल बनाया था. धीरे धीरे जब शेरो-शायरी की थोड़ी समझ आई तो लगने लगा कि राहत इंदौरी और मुनव्वर राणा सचिन तेंडुलकर और वीरेंद्र सहवाग की जोड़ी जैसे हैं. दोनों का अंदाज ऐसा था कि इन्हें सुनने में मजा आता था. ठीक वैसे ही जैसे सचिन और सहवाग की बल्लेबाजी को देखने में आता है. फर्क ये था कि मुशायरों के आयोजक इन दोनों शायरों को एक साथ मंच पर नहीं लाते थे. कोई एक शुरूआती शायरों में होता था और दूसरा अंत के शायरों में. जिससे शुरू से अंत तक मुशायरे का माहौल चढ़ा रहे.कभी मुनव्वर भाई मुशायरे के शुरूआती शायरों में होते तो कभी राहत इंदौरी. अफसोस, अब ये दोनों ही शायर मंच पर नहीं दिखेंगे. 2020 में राहत इंदौरी का निधन हो गया था.

युवाओं में गजब था मुनव्वर भाई का ‘क्रेज’

इलाहाबाद के बाद मैं दिल्ली आ गया. टीवी की नौकरी करने लगा. लेकिन मुनव्वर भाई से फोन पर संपर्क कायम रहा. 2007 में एक चैनल के ‘इंडक्शन मीटिंग’ में गया था.वहां पत्रकारिता के कई नए बच्चे भी थे.मीटिंग खत्म होने पर हर किसी को कुछ सुनाना था. एक छात्र ने मुनव्वर भाई का शेर सुनाया- मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई.उसने शब्दों को थोड़ा इधर-उधर कर दिया था. मीटिंग खत्म होने के बाद जब हम लोग एक साथ लौट रहे थे तो मैंने उसे सही शेर सुनाया और बताया कि ये शेर मुनव्वर भाई की बड़ी पहचान है. सामने से सवाल आया- आप मुनव्वर राणा साहब को जानते हैं. मैंने भी जोश-जोश में जवाब देने की बजाए सीधे मुनव्वर भाई को फोन ही कर दिया. उन्होंने फोन उठाया तो मैंने बताया कि कुछ नए बच्चे हैं, आपको बहुत पढ़ते हैं, डरते-डरते मैंने कहा मुनव्वर भाई वो शेर इन्हें सुना ही दीजिए अगली आवाज मुनव्वर भाई की थी.

”किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई

मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई”

ये मुनव्वर भाई की सहजता ही थी कि बाद में भी कई बार हमने उनसे फोन पर ही शेर सुन लिए. कोराना का घनघोर समय था. हर रोज किसी ना किसी के ना रहने की खबर मिल रही थी. एक दिन मन उदास था. मुनव्वर भाई को फोन करके बात की थी, उन्होंने कई शेर सुनाए. बड़ा अच्छा लगा था, अफसोस, वो आवाज अब कभी सुनाई नहीं देगी.

जब सचिन तेंडुलकर ने कहा ये शेर मुझे मैसेज कर देना

मैं स्पोर्ट्स की कवरेज से जुड़ा रहा. मोहाली में भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज खेल रही थी. साल 2008 की बात है. उस टेस्ट मैच में सचिन तेंडुलकर ने टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन के ब्रायन लारा के रिकॉर्ड को तोड़ा था.उसके बाद सचिन के इंटरव्यू का मौका आया. मैंने इंटरव्यू की शुरूआत मुनव्वर भाई के शेर के साथ कुछ इस तरह की थी.

”उन घरों में जहां मिट्टी के घड़े होते हैं

कद में छोटे हों मगर लोग बड़े होते हैं”

सचिन तेंडुलकर के कद से जोड़ते हुए उस इंटरव्यू में उन्हें उनके पिता की दी हुई सीख पर बाततीच हुई थी.इंटरव्यू खत्म हुआ तो सचिन तेंडुलकर ने कहा- आप ने जो शुरू में कहा था वो मैसेज कर दीजिएगा.

बात बात में शायरी करते थे मुनव्वर राणा

कई बरस पहले की बात है, घुटनों में तकलीफ को लेकर मुनव्वर भाई एम्स में भर्ती थे. मैं देखने गया, सामान्य बातचीत हो रही थी, फिर एनसीआर में जमीनों के दाम पर बातचीत शुरू हो गई. उन दिनों मैं गाजियाबाद के इंदिरापुरम में रहता था, मैंने बताया कि मैंने वहां 2005 के आस-पास जो घर लिया था वो अब कितना महंगा हो गया है,, एक दो लोग और वहां थे, उन्होंने भी जमीनों की बढ़ती कीमतों पर कुछ-कुछ कहा. अचानक मुनव्वर भाई कहने लगे- शिवेंद्र भाई, आपने गौर किया- जब से जमीनों की कीमतें बढ़ने लगीं… तभी से मशीनों की कीमतें भी बढ़ने लगीं. इसके बाद उन्होंने इसी ‘बहर’ में एक दो शब्द और जोड़े. फिर खुद ही मुस्करा कर बोले- ये तो गजल हो गई. कितनी यादें हैं जो जेहन में घूम रही हैं.अपने शेरों में कितना कुछ देकर आप गए मुनव्वर भाई आपने मेरे लिए शायरी के दरवाजे खोले, जहां कई बड़े-बड़े नामों से परिचय हुआ. अलविदा मुनव्वर भाई…

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