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मंत्रिमंडल के गठन में साधा रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट पर निशाना

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झाबुआ। रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट पर मंत्रीमंडल गठन के बहाने मोहन यादव सरकार ने सीधा निशाना साधा है। इस संसदीय क्षेत्र से तीन कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं। कुल आठ विधानसभा सीट आती हैं जिसमें से चार सीट भाजपा के हाथ लगी। अब उन चार विधायकों में से तीन को कैबिनेट मंत्री के रूप में सोमवार को शपथ दिलवाई गई।

तीनों मंत्री अलग-अलग वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक सामान्य वर्ग से तो दो आदिवासी है। आदिवासी में भी एक भील व दूसरे भिलाला उपजाति के हैं। मिशन 2024 को लेकर भाजपा ज्यादा आक्रमक दिखाई दे रही हैं। उनके 29-0 अभियान में रतलाम, झाबुआ व आलीराजपुर जिले को मिलाकर बनी संसदीय सीट चुनौतीपूर्ण प्रतीत हो रही थी।

वजह यह है कि विधानसभा चुनाव में केवल दो प्रतिशत वोट का दोनों दलों में अंतर रहा। इसके अलावा भले ही दो बार मोदी लहर में भाजपा जीत गई मगर परंपरागत रूप से उक्त संसदीय सीट कांग्रेस की ही रही है। ऐसे में भाजपा ने कोई जोखिम नहीं लेते हुए संसदीय सीट के तहत आने वाले तीनों जिलों में एक-एक कैबिनेट मंत्री दे दिया।

सिर्फ पक्ष व विपक्ष

झाबुआ व आलीराजपुर जिले में तो पक्ष-विपक्ष के सिवाए कुछ नहीं बचा है। दोनों जिले से भाजपा के दो विधायक जीते। दोनों को ही मंत्री बना दिया गया। झाबुआ जिले की तीन विधानसभा सीट में झाबुआ व थांदला पर कांग्रेस जीती। केवल पेटलावद भाजपा के हाथ लगा। अब पेटलावद की वरिष्ठ विधायक निर्मला भूरिया को केबिनेट मंत्री बना दिया गया है। आलीराजपुर जिले में दो विधानसभा सीट है। जोबट कांग्रेस के पास गई है तो आलीराजपुर में भाजपा जीती। अब आलीराजपुर के विधायक नागर सिंह चौहान को कैबिनेट मंत्री पद से नवाज दिया गया है।

बड़ी लीड का पुरस्कार

इस संसदीय सीट के तहत ही रतलाम जिले की तीन सीट आती हैं। रतलाम शहर, रतलाम ग्रामीण व सैलाना। सैलाना में तीसरी शक्ति का उदय हुआ है। वहीं रतलाम शहर व ग्रामीण से भाजपा जीती। रतलाम शहर से 60 हजार से अधिक की लीड अभी वही पिछले लोकसभा चुनाव में 40 हजार से अधिक की लीड भाजपा को मिली है। इस बड़ी लीड का पुरस्कार रतलाम शहर के विधायक चेतन कश्यप को कैबिनेट मंत्री बनाकर दिया गया है।

यह रहा था परिणाम

उक्त संसदीय क्षेत्र में भाजपा को 43 प्रतिशत वोट मिले वही कांग्रेस को 41 प्रतिशत वोट मिले। महज दो प्रतिशत वोट का अंतर इस सीट को लोकसभा चुनाव 2024 की दृष्टि से रोचक बना रहा है। अन्य प्रत्याशियों के हिस्से में 16 प्रतिशत वोट शेयरिंग रहा।

यह है इतिहास

जब सपा का वर्चस्व था, उस समय भी यह संसदीय सीट कांग्रेस के पास रही है। आजादी के बाद 1952, 1957, 1962 व 1967 लोकसभा चुनाव में लगातार कांग्रेस प्रत्याशी दिल्ली पहुंचते रहे। 1971 व 1977 में जरूर कांग्रेस पराजित हुई। 2014 लोकसभा चुनाव भाजपा पहली बार निर्मला भूरिया जीतीं लेकिन अगले ही साल 2015 का लोकसभा उप चुनाव प्रदेश सरकार के दम लगाने के बावजूद कांग्रेस जीत गई। 2019 का पिछला लोकसभा चुनाव मोदी लहर में भाजपा ने जीता।

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