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हलषष्ठी आज, जान लीजिए इस व्रत का महत्व, पूजा विधि

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हर वर्ष भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी के नाम से जाना जाता है। इस दिन महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस साल हलषष्ठी का व्रत मंगलवार रखा जाएगा। इसे कुछ जगहों पर ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम को समर्पित है। नवविवाहिता संतान सुख के लिए यह व्रत रखती हैं।

ज्योतिषाचार्य विनोद गौतम ने बताया कि पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि चार सितंबर को रात 9:30 बजे शुरू होगी। यह अगले दिन पांच सितंबर को रात 8:25 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर हलषष्ठी का व्रत पांच सितंबर को रखा जाएगा।

पं. रामजीवन दुबे गुरुजी के मुताबिक हलषष्ठी पर बलराम जी के साथ ही छठ माता की पूजा भी की जाती है। महिलाएं इस दिन छठ माता के लिए व्रत-उपवास करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस तिथि पर व्रत-उपवास करने और छठ माता की पूजा करने से संतान को सुख मिलता है, संतान की बाधाएं खत्म होती हैं। ये व्रत घर-परिवार के सभी लोगों के अच्छे स्वास्थ्य और अच्छे जीवन की कामना से किया जाता है।

जन्माष्टमी से पहले मनाते हैं बलदाऊ की जयंती

हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। इससे दो दिन पहले हलषष्ठी मनाई जाती है। द्वापर युग में इस तिथि पर शेषनाग जी ने वसुदेव और रोहिणी के यहां बलराम के रूप में अवतार लिया था। रोहिणी श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की पहली पत्नी थीं। सुभद्रा भी रोहिणी जी की पुत्री थीं। बलदाऊ हल और मूसल को शस्त्र के रूप में धारण करते थे, इस कारण उन्हें हलधर भी कहते हैं। इस पर्व पर बलराम और श्रीकृष्ण की विशेष पूजा करना चाहिए।

हलछठ पर कर सकते हैं ये शुभ काम

महिलाओं को स्नान के बाद घर की दीवार पर छठ माता की तस्वीर लगानी चाहिए और पूजन करना चाहिए। गणेश जी और देवी पार्वती की भी पूजा इस दिन करें। पूजा में हलषष्ठी की कथा पढ़ी-सुनी जाती है। मान्यता है कि इस दिन ऐसी सब्जियों का और ऐसे अन्न का सेवन करना चाहिए, जिन्हें बिना हल की मदद से उगाया जाता है।हलषष्ठी के दिन माताओं के लिए महुआ की दातुन करने और महुआ खाने का विधान है। इस दिन गाय के दूध व दही का सेवन नहीं करना चाहिए।

हलछठ उपवास का महत्व

मान्यताओं के अनुसार बलराम का प्रमुख शस्त्र हल है। इसे धारण करने की वजह से उन्हें हलधर भी कहा जाता है। उन्हीं के नाम पर इस व्रत को हलषष्ठी के नाम से जाना जाता है। इस व्रत में खेती में उपयोग होने वाले सामान की पूजा होती है। हलछठ की पूजा में महुआ, पसई के चावल, चना, मक्का, ज्वार, सोयाबीन व धान की लाई व भैंस के दूध व गोबर का विशेष महत्व रहता है। हलछठ के दिन दोपहर में घर-आंगन में महुआ, बेर की डाल, कांस के फूल से हलछठ स्थापित कर श्रद्धाभाव से पूजा अर्चना की जाती है। सतगजरा, तेल, चूड़ी, काजल, लकड़ी की ककई, बांस की टोकनी, नारियल, केला, ककड़ी का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

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