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सारा जमाना घूम के…मैं मां की गोद में लौट आया

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इंदौर। सनातन का सत्व इतना गहरा है कि जिस आत्मा को छू जाए, वह फिर आनंद में डूबती चली जाती है। यह जो चित्र आप देख रहे हैं, इसमें दिख रहे शख्स इन दिनों ऐसे ही गहन जीवन-आनंद में डूबे हुए हैं। ये हैं योगलाइफ ग्लोबल ब्राजील व महू (इंदौर) के समीप स्थित सत्यधारा आश्रम के संचालक पंडित राधेश्याम मिश्रा। दुनिया घूम चुके पंडित मिश्रा ने दुनिया के 100 से अधिक शहरों में हजारों को योग सिखाया। बीते दिनों इन्होंने अनूठी गूगल फ्री साधना की। मोबाइल, टीवी, गूगल, फेसबुक, वाट्सएप सब आश्रम में छोड़ मां नर्मदा किनारे ध्यान करने चले गए। नर्मदा किनारे कुटिया बनाई और 21 दिन तक ऋषि-मुनियों-सा जीवन जिया। यह स्वयं को जानने की यात्रा थी। सनातन ऐसी ही यात्राओं में घटित होता है।

भारत के तमाम ऋषि-मुनियों के शोध का यही निकष रहा है कि यदि आपने अपने मन को साध लिया, तो जीवन सध गया। ऐसे ही किसी भाव से यह सूक्ति उपजी है-मन चंगा, तो कठौती में गंगा। बीते दिनों एक व्यंग्य लेखक ने इस सूक्ति को कनाडा में जी लिया। हुआ यूं कि सेवानिवृत्ति का आनंद ले रहे लेखक मोहन वर्मा अपने बेटी-दामाद से मिलने टोरंटो (कनाडा) गए हुए हैं। वहां उन्होंने जब देखा कि बुजुर्गों के लिए भी पांच किलोमीटर की मैराथन दौड़ हो रही है, तो वे झट से तैयार हो गए। जूते पहने, घुटनों का आइल-पानी जांचा, फेफड़ों में हौसले की हवा भरी और दौड़ गए। इस सुपरपावर मैराथन में 486 प्रतिभागियों के बीच वे अपने आयु वर्ग में तीसरे स्थान पर आए। प्रमाण पत्र मिला तो बुजुर्गियत हवा हो गई। मन चंगा था इसलिए टोरंटो में उन्होंने अपने लिए आनंद की गंगा ढूंढ ली।

उस मर्मस्पर्शी कोशिश ने जीत लिया मन

मोबाइल स्क्रीन के जरिए हर हाथ तक पहुंची वैचारिक गंदगी ने समाज का नजरिया बहुत दूषित कर दिया है। किंतु इस अंधड़ में भी कुछ टिमटिमाते दीपक सच्ची भावनाओं को बचाए हुए हैं। बीते दिनों इसका मर्मस्पर्शी उदाहरण देखने को मिला। दरअसल, विचारों के क्षरण के इस दौर में कालेज के लड़के-लड़कियों के बीच कैसी बातें होती होंगी, इसकी कल्पना भी असहज कर देती है। किंतु एक युवक ने इस घटियापन को अपनी पवित्र भावनाओं से ध्वस्त कर दिया। वह बैग में राखियां लिए कालेज पहुंचा और मंगल भाव लिए क्लासमेट बहनों से राखी बंधवाई। लड़कियां हैरान हुईं क्योंकि आज के माहौल ने उनके मन में अनजान युवक की बहन होने का पवित्र भाव ही नष्ट कर दिया है। किंतु उस युवक के चेहरे की सच्चाई देख वे तुरंत सहज हुईं और बहुत सम्मान व गर्व से राखी बांधी। यह पवित्रता जिंदा रहे, यह मंगलता जीवंत रहे।

जीत-हार सब पीछे छूटा…मन कुछ ऐसा डूबा

अध्यात्म कई स्वरूपों में घटित हो सकता है। इसका एक स्वरूप शास्त्रीय नृत्य में डूब जाना भी है। बीते सप्ताह ऐसा ही हुआ, जब एक किशोरी कथक के आनंद में कुछ ऐसी डूबी कि फिर डूबती चली गई। हुआ यूं कि श्रीलक्ष्मी पिल्लई नामक किशोरवय छात्रा को स्कूल से एक डांस स्पर्धा में हिस्सा लेने को कहा गया। चूंकि श्रीलक्ष्मी की वैचारिक जड़ें दक्षिण भारत से हैं इसलिए संस्कृति के प्रति उनके परिवार में गहन शुद्धता है। अत: उन्होंने बालीवुड के किसी घटिया डांस के बजाय महान भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक को चुना। श्रीलक्ष्मी ने अभ्यास आरंभ किया और ताल चौताल, राग मालकौंस में निबद्ध देवाधिदेव महादेव की स्तुति तैयार की। वे इसके आनंद में ऐसी डूबती चली गईं मानो किशोर उम्र में ही साधना का सत्व जान लिया हो। श्रीलक्ष्मी के लिए अब स्पर्धा में जीत-हार का कोई मोल नहीं, उस बिटिया ने इससे कहीं अनमोल कुछ पा लिया है।

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