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World Stroke Day Special: अब युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रहा है ब्रेन स्ट्रोक, जानें इसके शुरुआती लक्षण और बचाव के जरूरी उपाय

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नई दिल्ली: हर साल 29 अक्टूबर को मनाए जाने वाले ‘वर्ल्ड स्ट्रोक डे’ (विश्व स्ट्रोक दिवस) का मुख्य उद्देश्य आम जनता को इस गंभीर और जानलेवा स्वास्थ्य समस्या के प्रति जागरूक करना है। अब तक ब्रेन स्ट्रोक को मुख्य रूप से केवल वृद्ध या बुजुर्ग उम्र के लोगों में होने वाली बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन बदलती जीवनशैली और खानपान की अस्वस्थ आदतों के चलते अब यह समस्या कम उम्र के युवाओं में भी तेजी से देखने को मिल रही है। इसके पीछे मुख्य रूप से खराब लाइफस्टाइल, उच्च रक्तचाप (हाई बीपी), मधुमेह (डायबिटीज) और बढ़ता मोटापा जैसी स्वास्थ्य समस्याएं जिम्मेदार मानी जा रही हैं। देश के जाने-माने चिकित्सकों का कहना है कि स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचानना बेहद जरूरी होता है, ताकि तुरंत सही इलाज शुरू किया जा सके। उपचार में थोड़ी सी भी देरी होने पर मानव मस्तिष्क (दिमाग) की कोशिकाओं को गंभीर और स्थाई नुकसान पहुंच सकता है।

धूम्रपान और शारीरिक निष्क्रियता बढ़ा रही है खतरा, जानिए कब और कैसे होती है स्ट्रोक की शुरुआत

चिकित्सकों के अनुसार, अत्यधिक धूम्रपान करने की आदत और शरीर में शारीरिक गतिविधियों की भारी कमी भी स्ट्रोक के खतरे को कई गुना बढ़ा देती है। जब दिमाग के किसी हिस्से में रक्त (खून) की आपूर्ति अचानक बाधित हो जाती है या मस्तिष्क की किसी रक्त वाहिका के फटने से ब्लीडिंग होने लगती है, जिससे जरूरी खून और ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, तो महज कुछ ही मिनटों के भीतर ब्रेन सेल्स क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। इस खतरनाक स्थिति के कारण ही व्यक्ति को ब्रेन स्ट्रोक का सामना करना पड़ता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, इसका जोखिम भी बढ़ता जाता है, लेकिन यह किसी भी वयस्क को किसी भी उम्र में अपनी चपेट में ले सकता है। इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसके शुरुआती संकेतों को समय पर न पहचान पाना है। अचानक चेहरे का एक तरफ झुक जाना, हाथों में अचानक कमजोरी महसूस होना, बोलने में साफ दिक्कत आना, शरीर का संतुलन बिगड़ना या अचानक आंखों से देखने में परेशानी होना इसके प्रमुख संकेत हो सकते हैं। कई बार लोग इन्हें कुछ पलों की थकान या मामूली परेशानी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जो आगे चलकर बेहद घातक साबित होता है।

कुछ मिनटों में गायब होने वाले लक्षण भी हो सकते हैं बड़े खतरे की चेतावनी, ट्रांसिएंट इस्कीमिक अटैक को न करें नजरअंदाज

विशेषज्ञ बताते हैं कि स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण कई बार कुछ ही मिनटों में ठीक होते हुए प्रतीत होते हैं, जिससे मरीज और उसके परिजन यह गलतफहमी पाल लेते हैं कि अब खतरा पूरी तरह टल गया है। हालांकि, कुछ समय के लिए दिखाई देकर गायब होने वाले ये लक्षण भी भविष्य में आने वाले किसी बड़े और भयानक स्ट्रोक की गंभीर चेतावनी हो सकते हैं। इसलिए, यदि लक्षण अपने आप ठीक भी हो जाएं, तब भी तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से मेडिकल जांच कराना अनिवार्य है। दिल्ली के श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट के न्यूरोइंटरवेंशन एवं न्यूरोसर्जरी कंसलटेंट डॉ. मनोज मिधा के अनुसार, अनियंत्रित ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और स्मोकिंग इसके सबसे बड़े जोखिम कारक हैं। यदि अचानक शरीर के किसी अंग में कमजोरी आए या बोलने में लड़खड़ाहट हो, तो भले ही वे कुछ देर में सामान्य हो जाएं, वे ‘ट्रांसिएंट इस्कीमिक अटैक’ (TIA) के संकेत हो सकते हैं, इसलिए बिना एक पल गंवाए अस्पताल पहुंचना चाहिए।

दैनिक जीवनशैली में सुधार और आदतों में बदलाव से काफी हद तक कम किया जा सकता है स्ट्रोक का जोखिम

चिकित्सकों का स्पष्ट मानना है कि ब्रेन स्ट्रोक के खतरे से सुरक्षित रहने के लिए रोजमर्रा की आदतों में सकारात्मक बदलाव लाना बहुत आवश्यक है। अपने खानपान में संतुलित और पौष्टिक आहार को शामिल करें, शारीरिक रूप से सक्रिय रहें, नियमित रूप से योग या व्यायाम करें और तंबाकू या सिगरेट के सेवन से पूरी तरह दूरी बना लें। इसके अतिरिक्त, समय-समय पर अपने ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहें और अपने शुगर लेवल को नियंत्रित रखें। युवाओं को भी इन लक्षणों के प्रति पूरी तरह सतर्क रहना चाहिए, विशेषकर तब जब उनकी जीवनशैली में तनाव और अन्य जोखिम कारक शामिल हों। लक्षणों की पहचान में देरी होने से रिकवरी के विकल्प बेहद सीमित हो जाते हैं और लंबे समय तक शारीरिक व मानसिक परेशानियां बनी रहने का खतरा बढ़ जाता है।

बीमारी के बाद सही पुनर्वास और ‘BE-FAST’ फॉर्मूले की मदद से बचाई जा सकती है मरीज की जिंदगी

बेंगलुरु के स्पर्श हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजिस्ट कंसलटेंट डॉ. अपूरूपा जनाभाटला ने बताया कि स्ट्रोक के उपचार के बाद कई मरीजों को चलने-फिरने, बोलने, याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, स्पीच थेरेपी और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सही मेडिकल देखभाल और नियमित रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) से मरीज की कार्यक्षमता को काफी हद तक सुधारा जा सकता है। आपात स्थिति में स्ट्रोक के लक्षणों को आसानी से याद रखने और पहचानने के लिए डॉक्टर ‘BE-FAST’ तरीका अपनाने की सलाह देते हैं:

  • B (Balance): अचानक शरीर का संतुलन बिगड़ना या चक्कर आना।

  • E (Eyes): आंखों से धुंधला दिखना या देखने में अचानक परेशानी होना।

  • F (Face): चेहरे का एक तरफ अचानक नीचे की ओर झुक जाना।

  • A (Arms): हाथों या पैरों में अचानक कमजोरी या सुन्नपन महसूस होना।

  • S (Speech): बोलते समय आवाज का लड़खड़ाना या समझ न आना।

  • T (Time): बिना एक भी सेकंड गंवाए तुरंत नजदीकी अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचना।

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