Ahmedabad Serial Blasts Case: सुप्रीम कोर्ट ने आतंकी मोहम्मद तनवीर की फांसी की सजा पर लगाई रोक, जेल प्रशासन से मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2008 के अहमदाबाद सीरियल बम धमाकों के दोषी और कुख्यात आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन के सदस्य मोहम्मद तनवीर की मौत की सजा यानी फांसी पर रोक लगा दी है. यह महत्वपूर्ण आदेश जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की तीन सदस्यीय विशेष पीठ द्वारा जारी किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में आतंकवाद से जुड़े इस मामले में दोषी मोहम्मद तनवीर को निचली और उच्च अदालत से मिली मौत की सजा के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी है. दरअसल, दोषी तनवीर ने गुजरात हाई कोर्ट के उस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी, जिसमें कुल 38 दोषियों की फांसी की सजा को बरकरार रखा गया था.
📋 जेल प्रशासन से मांगी गई आचरण रिपोर्ट और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन का आदेश
इस मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने संबंधित जेल अधीक्षक को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे आगामी 8 हफ्तों के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट अदालत को सौंपें. इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से जेल में रहने के दौरान मोहम्मद तनवीर के काम, उसके आचरण और समग्र व्यवहार की पूरी जानकारी माँगी गई है. इसके अलावा, कोर्ट ने जेल प्रशासन को यह भी कड़ा आदेश दिया है कि किसी अधिकृत सरकारी अस्पताल से तनवीर का विस्तृत मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन (साइकोलॉजिकल असेसमेंट) कराया जाए और उसकी रिपोर्ट भी तयशुदा 8 हफ्तों के भीतर पेश की जाए. साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़े सभी मूल रिकॉर्ड ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट से तलब कर लिए हैं और गुजरात सरकार को भी 8 सप्ताह के भीतर प्रोबेशन अधिकारियों की रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है.
💥 क्या था 2008 का अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट? जानिए मामले से जुड़ी पूरी पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 26 जुलाई 2008 को गुजरात के अहमदाबाद शहर में मात्र 70 मिनट के अंतराल के भीतर कुल 21 सिलसिलेवार खतरनाक बम धमाके हुए थे, जिन्होंने पूरे देश को दहला दिया था. इन दहला देने वाले हमलों में 56 निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी और 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे. इस सनसनीखेज मामले में विशेष अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद फरवरी 2022 में कुल 38 दोषियों को मौत की सजा और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में गुजरात हाई कोर्ट ने भी सही ठहराते हुए बरकरार रखा था. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इस मामले के एक अन्य दोषी अब्बू अबुबकर बरेलवी की फांसी की सजा पर भी रोक लगा चुका है.
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