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IIT (ISM) धनबाद की अनूठी पहल: बोकारो में शुरू हुआ ‘सिक्की कला’ प्रशिक्षण, ग्रामीण महिलाओं को मिलेगी स्वरोजगार की नई राह

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धनबाद (झारखंड): पारंपरिक लोक कलाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनसे जुड़े स्थानीय कारीगरों के लिए टिकाऊ आजीविका के अवसर विकसित करने की दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT-ISM), धनबाद ने एक महत्वपूर्ण पहल की है।

संस्थान के पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग (ESE) के अंतर्गत संचालित EIACP कार्यक्रम केंद्र ने ‘झारखंड फाउंडेशन केंद्र’ के सहयोग से बोकारो जिले के पिंड्राजोरा में ‘सतत आजीविका और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए सिक्की कला’ विषयक सात दिवसीय क्षमता निर्माण प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की है। यह प्रशिक्षण 4 सितंबर तक चलेगा।

यह समग्र पहल भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित की जा रही है, जिसका उद्देश्य विलुप्त होती सिक्की कला को पुनर्जीवित कर स्थानीय स्तर पर रोजगार व स्वरोजगार की व्यापक संभावनाएं सृजित करना है।

🌿 मिशन LiFE के अनुरूप पहल: संस्थान में उत्पादों की बिक्री के लिए मिलेंगे निःशुल्क स्टॉल

सस्टेनेबल आजीविका और प्रोत्साहन योजना:

  • मिशन LiFE से जुड़ाव: यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री के विजन ‘मिशन LiFE’ (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) की मूल अवधारणा के अनुरूप है, जो पर्यावरण अनुकूल उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा देता है।

  • बाजार से सीधा जुड़ाव: पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष सह EIACP समन्वयक प्रो. आलोक सिन्हा ने बताया कि प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को IIT (ISM) धनबाद में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और कार्यक्रमों में अपने हस्तशिल्प उत्पादों के प्रदर्शन व बिक्री हेतु निःशुल्क स्टॉल उपलब्ध कराए जाएंगे।

  • पारंपरिक ज्ञान का सम्मान: प्रो. सुनील कुमार गुप्ता और झारखंड फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक डॉ. जयदेव महतो ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय शिल्पकला को जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।

🎨 क्या है सिक्की हस्तशिल्प कला? प्राकृतिक घास से बनते हैं आकर्षक सजावटी उत्पाद

कला की विशेषताएं और सामग्री:

  • प्राकृतिक कच्चा माल: सिक्की कला झारखंड व बिहार अंचल की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा है, जिसमें प्राकृतिक रूप से उगने वाली ‘सिक्की घास’ का उपयोग किया जाता है।

  • उत्पाद शृंखला: इस विशेष घास से टोकरियां, डिब्बे (कंटेनर), पेन स्टैंड, आभूषण, दीवार पर सजाने वाली कलाकृतियां और दैनिक उपयोग की आकर्षक वस्तुएं तैयार की जाती हैं।

  • पर्यावरण हितैषी: 100% बायोडिग्रेडेबल और प्राकृतिक होने के कारण यह प्लास्टिक के बर्तनों व सजावटी सामानों का बेहतरीन और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है।

👩‍🏫 JSLPS स्वयं सहायता समूहों की 30 महिलाएं ले रहीं प्रशिक्षण: टॉप 3 प्रतिभागी होंगे सम्मानित

कार्यशाला का प्रारूप और मूल्यांकन:

  • मास्टर ट्रेनर्स द्वारा प्रशिक्षण: विशेषज्ञ प्रशिक्षक नाजदा खातून और मो. जसीम द्वारा महिलाओं को घास की रंगाई, बुनाई और डिजाइनिंग की व्यावहारिक बारीकियां सिखाई जा रही हैं।

  • शपथ ग्रहण: कार्यक्रम की शुरुआत में EIACP केंद्र की सूचना अधिकारी डॉ. अवंतिका चंद्रा ने सभी उपस्थित प्रतिभागियों को पर्यावरण संरक्षण हेतु मिशन LiFE की शपथ दिलाई।

  • व्यावहारिक कौशल विकास: झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) से जुड़ी स्वयं सहायता समूह (SHG) की दीदियों और गृहिणियों समेत कुल 30 पंजीकृत महिलाएं इसमें भाग ले रही हैं।

  • पुरस्कार एवं सम्मान: EIACP सह-समन्वयक प्रो. सुरेश पांडियन ने बताया कि 4 सितंबर को समापन अवसर पर रचनात्मकता, फिनिशिंग और कौशल का मूल्यांकन कर श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले शीर्ष 3 प्रशिक्षुओं को विशेष रूप से पुरस्कृत व सम्मानित किया जाएगा।

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