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कांवड़ यात्रा नियम: सावन शिवरात्रि पर जल चढ़ाने के बाद भी रखें इन बातों का ध्यान, न करें ये गलतियां

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नई दिल्ली: सावन मास का शुभारंभ होते ही भगवान शिव के भक्तों के लिए सबसे प्रमुख आकर्षण कांवड़ यात्रा होती है। प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों श्रद्धालु पवित्र गंगाजल लाने हेतु पैदल यात्रा करते हैं तथा सावन शिवरात्रि के पावन अवसर पर भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं। सामान्यतः यह धारणा प्रचलित है कि कांवड़ में लाया गया गंगाजल शिवलिंग पर अर्पित करते ही यात्रा पूर्ण हो जाती है, परंतु सनातन धार्मिक परंपराओं में कांवड़ यात्रा का विधान केवल जल लाने और चढ़ाने तक सीमित नहीं माना गया है। जिस प्रकार कांवड़ यात्रा के दौरान भक्त कड़े नियमों एवं संयम का पालन करते हैं, ठीक उसी प्रकार जलाभिषेक के पश्चात भी सावन के शेष दिनों में विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है।

📅 कांवड़ यात्रा कब से कब तक है? जानें सावन शिवरात्रि और जलाभिषेक की मुख्य तिथियां

वर्ष 2026 में कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से प्रारंभ होकर 11 अगस्त 2026 (सावन शिवरात्रि) तक आयोजित की जाएगी।

इस अवधि में देश भर से शिवभक्त गंगाजल लेकर अपने-अपने गंतव्य स्थलों के शिव मंदिरों में पहुंचेंगे और सावन शिवरात्रि के शुभ योग में भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे। यद्यपि सावन का संपूर्ण पवित्र महीना 28 अगस्त 2026 तक रहेगा। कांवड़ यात्रा की मुख्य अवधि जलाभिषेक तथा सावन शिवरात्रि तक मानी जाती है, किंतु संपूर्ण सावन माह में भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना का क्रम अनवरत जारी रहता है।

🥗 जलाभिषेक के पश्चात भी बनाए रखें सात्विकता, तामसिक भोजन व नशे से दूर रहें

कांवड़ यात्रा के दौरान भक्त भगवान शिव के ध्यान में मग्न रहकर कठोर नियमों का पालन करते हैं।

जलाभिषेक संपन्न होने के उपरांत भी संपूर्ण सावन मास के समापन तक सात्विक जीवनशैली अपनाना अत्यंत आवश्यक माना गया है। इस दौरान मांसाहार, मदिरा एवं सभी प्रकार के नशीले पदार्थों से पूर्णतः दूर रहने का विधान है। इसके अतिरिक्त तामसिक खाद्य पदार्थों से परहेज करते हुए शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करने पर बल दिया जाता है। मान्यता है कि धार्मिक अनुष्ठान या यात्रा पूर्ण होने के बाद भी मन, वचन और कर्म से पवित्रता अक्षुण्ण रखनी चाहिए।

🕉️ सावन भर करें भगवान शिव का स्मरण, ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें

शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करने के पश्चात भी सावन के बाकी बचे दिनों में नियमित रूप से भगवान शिव की पूजा-अर्चना करें तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ महामंत्र का निरंतर जाप करते रहें।

शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के उपरांत श्रद्धा एवं भक्ति भाव से कुछ समय शांत मन से देवालय (मंदिर) में बैठकर भगवान चंद्रमौलेश्वर का ध्यान करना आत्मिक शांति एवं अक्षय पुण्य प्रदान करने वाला माना जाता है।

🎋 कांवड़ की पवित्रता और उसके उचित रखरखाव का रखें विशेष ध्यान

कांवड़ यात्रा के दौरान एवं उसके पश्चात भी कांवड़ को अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना जाता है।

अतः जलाभिषेक के बाद कांवड़ को किसी भी अस्वच्छ स्थान पर लापरवाही से रखने या उसके साथ किसी भी प्रकार का अपवित्र व्यवहार करने से बचना चाहिए। कांवड़ को सदैव स्वच्छ एवं गरिमापूर्ण स्थान पर ही स्थापित करें।

🚫 जलाभिषेक के बाद क्रोध, अपशब्द और कलह से बचें

जलाभिषेक के उपरांत भी साधकों को अपने आचरण पर विशेष नियंत्रण रखना चाहिए।

किसी भी व्यक्ति से व्यर्थ विवाद करने, कटु अथवा अपशब्द बोलने और क्रोध करने से सर्वथा बचना चाहिए। कांवड़ यात्रा का मूल उद्देश्य केवल गंगाजल अर्पित करना मात्र नहीं, अपितु भक्ति, संयम, आत्म-नियंत्रण और अनुशासन को जीवन में उतारना है। इसलिए जलाभिषेक के उपरांत भी इन उच्च मानवीय एवं धार्मिक भावनाओं को बनाए रखना आवश्यक है।

🤝 अंत में जरूरतमंदों की सेवा व दान-पुण्य करें

कांवड़ यात्रा एवं जलाभिषेक पूर्ण होने के उपरांत अपनी श्रद्धा व सामर्थ्य के अनुसार निर्धन एवं जरूरतमंद लोगों की सहायता करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है।

किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराना, प्यासे को जल पिलाना अथवा वस्त्र व आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराना महापुण्यकारी माना जाता है। शास्त्र सम्मत दृष्टि से निस्वार्थ सेवा और दान को भगवान शिव की प्रत्यक्ष भक्ति का ही एक अभिन्न अंग स्वीकार किया गया है।

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