हरियाणा के अंबाला में बने शहीद स्मारक का उद्घाटन, 15 नवंबर से आम जनता के लिए खुलेगा— एक महीने तक फ्री एंट्री
अंबाला: हरियाणा के ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने मीडिया को आधिकारिक जानकारी देते हुए बताया कि देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम की याद में अंबाला में निर्मित भव्य ‘शहीद स्मारक’ का लोकापर्ण देश के केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह द्वारा गत 5 नवंबर 2026 को सफलतापूर्वक कर दिया गया है। मंत्री विज ने घोषणा की है कि आगामी 15 नवंबर 2026 से इस ऐतिहासिक स्मारक को आम जनता के दीदार के लिए पूरी तरह से खोल दिया जाएगा। खास बात यह है कि शुरुआती एक महीने तक यह स्मारक देखने आने वाले प्रतिदिन 500 लोगों के लिए पूरी तरह से निःशुल्क (फ्री) रहेगा।
सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक बुक करानी होगी टिकट, पहले एक महीने तक हर दिन केवल 500 लोगों को ही मिलेगा प्रवेश
मंत्री अनिल विज ने आगे बताया कि इस भव्य स्मारक का अवलोकन करने के लिए आने वाले नागरिकों को सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक अपनी प्रवेश टिकट बुक करानी होगी। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के विशेष निर्देशों के तहत यह निर्णय लिया गया है कि उद्घाटन के बाद शुरुआती एक महीने तक किसी भी दर्शक से टिकट का कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन सुव्यवस्था बनाए रखने के वास्ते एक दिन में केवल 500 लोगों को ही प्रवेश की अनुमति दी जाएगी।
ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बुक होगी टिकट, आधिकारिक वेबसाइट या मेमोरियल काउंटर से मिलेगी एंट्री
निःशुल्क प्रवेश का लाभ उठाने वाले चालकों और दर्शकों को भी अपनी टिकट बुक कराना अनिवार्य किया गया है। इसके लिए लोग आधिकारिक वेबसाइट ambalawarmemorial.com पर जाकर ऑनलाइन अपनी टिकट आसानी से बुक कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, दर्शकों की सुविधा के लिए स्वयं शहीद स्मारक परिसर के भीतर भी टिकट काउंटर और बुकिंग की उचित व्यवस्था की गई है ताकि किसी को कोई असुविधा न हो।
कांग्रेस के जन्म से 28 वर्ष पूर्व 10 मई 1857 को अंबाला छावनी से सुलग उठी थी आजादी की पहली सशस्त्र क्रांति की चिंगारी
इतिहास के पन्नों को याद करते हुए अनिल विज ने बताया कि देश की आजादी की यह पहली लड़ाई कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक गठन से ठीक 28 वर्ष पहले अंबाला छावनी (कैंट) की धरती पर 10 मई 1857 को शुरू हो चुकी थी। उन्होंने कहा कि मेरठ की घटना से 9 घंटे पहले ही अंबाला से इस संग्राम का शंखनाद हो चुका था। यह लड़ाई पूरी तरह से सशस्त्र थी और देश के कोने-कोने में लड़ी गई थी। उस दौर की क्रूरता को याद करते हुए उन्होंने कहा कि ब्रिटिश हुकूमत ने हमारे वीर शहीदों को पेड़ों से बांध-बांधकर गोलियों से छलनी किया था, उन पर कोल्हू चलवाए गए थे और क्रांतिकारियों के समर्थन वाले पूरे के पूरे गांवों को अंग्रेजों द्वारा आग के हवाले कर जला दिया गया था।
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