Jharkhand High Court Ruling: आपसी सहमति से तलाक के मामले में झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, रांची फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द
रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए रांची फैमिली कोर्ट के विवाह विच्छेद संबंधी आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। चतरा निवासी चंपा कुमारी और रांची के रहने वाले विशांत सागर के वैवाहिक विवाद पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पाया कि निचली अदालत द्वारा शादी की वास्तविक तारीख, वैवाहिक बंधन को खत्म करने को लेकर पत्नी की स्वैच्छिक सहमति और वित्तीय समझौते जैसे अहम पहलुओं की पर्याप्त और कानूनी रूप से सही जांच नहीं की गई थी। इस कमी को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने पूरे मामले को दोबारा से विचार के लिए फैमिली कोर्ट के पास वापस भेज दिया है और कानून के स्थापित प्रावधानों के तहत नए सिरे से कार्रवाई करने का सख्त निर्देश दिया है। यह फैसला माननीय न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ द्वारा एफए संख्या 121/2025 के अंतर्गत सुनाया गया है।
शादी की तारीख को लेकर दस्तावेजों और आदेश में सामने आया बड़ा अंतर
इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत तब हुई जब रांची फैमिली कोर्ट ने 17 अगस्त 2024 को दोनों पक्षों की आपसी रजामंदी के आधार पर तलाक का आदेश पारित कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ पत्नी चंपा कुमारी ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपील दायर की। अपीलकर्ता पत्नी की ओर से मुख्य रूप से यह पक्ष रखा गया कि उनकी वास्तविक शादी 21 अप्रैल 2024 को चतरा जिले के सिमरिया में संपन्न हुई थी, जबकि इसके उलट फैमिली कोर्ट के आदेश में विवाह की तारीख गलत तरीके से 21 अप्रैल 2023 दर्ज कर ली गई थी। हैरानी की बात यह है कि इस मामले में तलाक के लिए संयुक्त याचिका महज 12 जून 2024 को ही कोर्ट में दाखिल कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने तारीखों के इस बड़े अंतर को बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मानते हुए इस बात पर जोर दिया कि विवाह की वास्तविक तिथि की सत्यता की जांच करना बेहद आवश्यक था।
दहेज प्रताड़ना और अन्य गंभीर आरोप, जिन्हें अदालत ने नहीं माना है अंतिम सत्य
अपील दायर करने वाली पत्नी की तरफ से यह आरोप भी लगाए गए कि उनकी शादी के वक्त लड़के पक्ष को 8.51 लाख रुपये नकद और लगभग पांच लाख रुपये मूल्य के आभूषण दिए गए थे। इसके बावजूद उन्हें एक बुलेट मोटरसाइकिल की मांग को लेकर लगातार प्रताड़ित किया जाता रहा। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि अस्पताल में उनसे दबाव डलवाकर कुछ कागजातों पर हस्ताक्षर कराए गए तथा उनकी गर्भावस्था समाप्त होने से जुड़ी घटनाएं भी हुईं। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि ये सभी आरोप केवल अपीलकर्ता पत्नी के अपने कथन और दावे हैं, जिन्हें इस आदेश के माध्यम से हाईकोर्ट ने किसी भी रूप में सिद्ध या स्थापित तथ्य के रूप में घोषित नहीं किया है।
दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं द्वारा अदालत में रखी गई दलीलें
इस मामले की सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता पत्नी चंपा कुमारी की पैरवी करते हुए उनके अधिवक्ता मो. रजाउल्लाह अंसारी ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा। वहीं दूसरी तरफ, प्रतिवादी पति की तरफ से अधिवक्ता बिनोद सिंह ने अपनी दलीलें पेश कीं। पति के वकील की ओर से फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए आपसी सहमति के तलाक के आदेश का पुरजोर समर्थन किया गया। उनका कहना था कि दोनों पक्षों ने आपसी रजामंदी के बाद ही कानूनन अलग होने का फैसला लिया था, जिसके तहत पत्नी को चार लाख रुपये की राशि और उनका पूरा स्त्रीधन दिए जाने की बात तय हुई थी। दोनों पक्षों के वकीलों की तमाम दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद खंडपीठ ने यह माना कि मामले में वैधानिक प्रक्रियाओं और रजामंदी की वास्तविक स्थिति की गहराई से पड़ताल होना अनिवार्य है।
सहमति से तलाक के मामलों में भी कानूनी शर्तों और नियमों का पालन है अनिवार्य
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल मध्यस्थता (mediation) की प्रक्रिया में कोई समझौता हो जाने मात्र से अदालत की कानूनी और वैधानिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। फैमिली कोर्ट की यह स्पष्ट जिम्मेदारी बनती है कि वह पूरी तरह सुनिश्चित करे कि तलाक के लिए दी गई रजामंदी पूरी तरह स्वैच्छिक है या नहीं और क्या कानून की सभी अनिवार्य शर्तें पूरी हो रही हैं या नहीं। खंडपीठ ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि यदि विवाह वास्तव में 21 अप्रैल 2024 को हुआ था, तो 12 जून 2024 को दायर की गई याचिका के संदर्भ में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत शादी के बाद एक वर्ष तक अलग रहने की अनिवार्य कानूनी शर्त पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए था।
फैमिली कोर्ट को दिए गए सभी पहलुओं की नए सिरे से जांच करने के निर्देश
खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के पुराने तलाक आदेश को पूरी तरह खारिज करते हुए पूरे मामले को दोबारा से तस्दीक के लिए वापस भेज दिया है। अब फैमिली कोर्ट नए सिरे से विवाह की असली तारीख, आपसी आर्थिक व वित्तीय समझौतों, पत्नी की सहमति की स्वैच्छिकता और अन्य तमाम जुड़े हुए तथ्यों की तकनीकी व कानूनी पड़ताल करेगा। अदालत ने निर्देश दिया है कि दोनों पक्षकार इस आदेश की तारीख से अगले छह सप्ताह के भीतर फैमिली कोर्ट के समक्ष अनिवार्य रूप से उपस्थित हों और अपने-अपने पक्ष तथा साक्ष्य प्रस्तुत करें।
कानूनी पहलुओं की अनदेखी पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की कि निचली अदालत यानी फैमिली कोर्ट ने विवाह की वास्तविक और प्रमाणित तारीख तय किए बिना ही जल्दबाजी में तलाक का आदेश पारित कर दिया, जो कि बुनियादी कानूनी पहलुओं की साफ तौर पर अनदेखी है। खंडपीठ के अनुसार, इस प्रकार की चूक से अपीलकर्ता के कानूनी अधिकार सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं, जो कि वैधानिक प्रावधानों और पक्षकारों के अधिकारों के प्रति अपेक्षित प्रशासनिक संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि तलाक का आदेश रद्द होने का यह कतई अर्थ नहीं है कि पत्नी की तरफ से लगाए गए सभी गंभीर आरोप न्यायालय द्वारा सही मान लिए गए हैं। अब इन तमाम बिंदुओं और पक्षों पर फैमिली कोर्ट में नए सिरे से निष्पक्ष विचार किया जाएगा।
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