Festival Season Health Alert: त्योहारों में कहीं आप भी तो नहीं खा रहे जहरीले रंगों वाली मिठाइयां? सेहत के लिए हो सकता है खतरनाक
लुधियाना: भारत में उत्सवों और त्योहारों के दौरान मिठाइयों का आदान-प्रदान और सेवन हमारी सदियों पुरानी संस्कृति का एक अहम हिस्सा रहा है। शुभ अवसरों पर मुंह मीठा कराना आपसी प्रेम का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, त्योहारों की इस धूम के बीच मिठाइयों में धड़ल्ले से इस्तेमाल किए जाने वाले रंग कई बार स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट खड़े कर देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और खाद्य सुरक्षा अधिकारियों का यह स्पष्ट मानना है कि मिठाइयों को रंगने के लिए केवल भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा अनुमोदित मानकों का ही पालन किया जाना चाहिए, ताकि आम नागरिकों की सेहत सुरक्षित रह सके।
प्राकृतिक और सुरक्षित रंगों का उपयोग है बेहतर विकल्प
स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों और पारंपरिक मिष्ठान निर्माताओं के लिए प्रकृति ने कई ऐसे सुरक्षित विकल्प दिए हैं जिनसे मिठाइयों को खूबसूरत रंग दिए जा सकते हैं। इनमें पीले और सुनहरे रंग के लिए शुद्ध केसर और हल्दी, हरे रंग के लिए पिस्ता, पालक के रस या प्राकृतिक क्लोरोफिल, गुलाबी व लाल रंग के लिए ताजे चुकंदर के रस, अनार या गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा, भूरे रंग के लिए कोको, कॉफी या हल्के भुने हुए खोए और शक्कर का प्रयोग करना पूरी तरह से सुरक्षित माना जाता है।
अनुमोदित कृत्रिम खाद्य रंगों की निर्धारित सीमाएं
कानूनी रूप से, खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण द्वारा कुछ विशेष रासायनिक रंगों को तय मात्रा में उपयोग करने की अनुमति दी गई है। इनमें पीले रंग की मिठाइयों और पेड़े-लड्डू के लिए टार्ट्राजिन, नीले या हरे रंग के व्यंजनों के लिए ब्रिलियंट ब्लू, लाल या गुलाबी बर्फी और रसगुल्लों के लिए एलुरा रेड, तथा हरी मिठाइयों के लिए फास्ट ग्रीन जैसे रंग शामिल हैं। इनका उपयोग निर्धारित मानकों के दायरे में ही किया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक हैं ये प्रतिबंधित और गैर-खाद्य रंग
बाजार में कई बार मिठाइयों को जरूरत से ज्यादा चमकीला और आकर्षक दिखाने के लिए ऐसे खतरनाक और प्रतिबंधित रंगों का अवैध इस्तेमाल किया जाता है जो सीधे तौर पर इंसानी सेहत से खिलवाड़ हैं। इनमें ‘रोडामाइन-बी’ (जो मुख्य रूप से कपड़ा और चमड़ा रंगने के काम आने वाला एक औद्योगिक केमिकल है) के अलावा चंपई, पुड़िया और सम्राट जैसे स्थानीय रंग शामिल हैं। इन जहरीले केमिकल्स के सेवन से लिवर और किडनी पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, पाचन तंत्र पूरी तरह गड़बड़ा जाता है और भविष्य में कैंसर जैसी भयानक बीमारियों का खतरा कई गुना तक बढ़ जाता है।
बच्चों के विकास पर असर और गंभीर एलर्जिक प्रतिक्रियाएं
इन प्रतिबंधित और जहरीले रंगों को मानव शरीर आसानी से फिल्टर नहीं कर पाता है, जिससे शरीर में टॉक्सिसिटी बढ़ने लगती है। इसके प्रभाव से पेट में तेज मरोड़, उल्टी, दस्त, आंतों में सूजन और गंभीर अल्सर की शिकायत हो सकती है। इसके अलावा, ये हानिकारक केमिकल्स बच्चों के मानसिक विकास पर बुरा असर डालते हैं, जिससे उनमें हाइपरएक्टिविटी और एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं उभर सकती हैं। साथ ही, त्वचा पर चकत्ते, खुजली और सांस लेने में तकलीफ (अस्थमा) जैसी एलर्जी भी आम हो जाती है। हाल ही में स्वास्थ्य विभाग ने एक ऐसी अवैध फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया था जो एक्सपायर हो चुकी मिठाइयों को रिसाइकल करके उनमें घातक रंगों का इस्तेमाल कर रही थी।
विशेषज्ञों की सलाह- सावधानी ही बचाव का सबसे बड़ा साधन है
शहर के जाने-माने गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट (पेट रोग विशेषज्ञ) डॉ. दिनेश गुप्ता का कहना है कि प्रतिबंधित रंगों और बासी या एक्सपायर हो चुकी मिठाइयों का सेवन शरीर के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होता है। उन्होंने आम जनता को सलाह दी है कि हमेशा प्रतिष्ठित और भरोसेमंद दुकानों से ही मिठाइयों की खरीदारी करें। यदि बाजार में किसी भी प्रकार की मिलावट या गड़बड़ी नजर आए, तो उसकी सूचना तुरंत संबंधित स्वास्थ्य विभाग को दी जानी चाहिए ताकि समय रहते उचित कार्रवाई की जा सके।
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