IIT ISM Dhanbad Durga Puja: धनबाद के IIT-ISM पंडाल की अनूठी थीम, क्रिटिकल मिनरल्स और सेमीकंडक्टर तकनीक से दिया आत्मनिर्भरता का संदेश
धनबाद: दुर्गा पूजा के उत्सव में आस्था और परंपरा की छटा तो हर तरफ देखने को मिल रही है, लेकिन धनबाद के IIT-ISM का दुर्गा पूजा पंडाल इस बार एक बेहद अलग और अनूठा संदेश दे रहा है. यहां मां दुर्गा की आराधना के बीच क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिजों) और सेमीकंडक्टर जैसी आधुनिक तकनीकों की अहमियत को बहुत ही शानदार तरीके से प्रदर्शित किया गया है. यह वही तकनीकी क्षेत्र है, जिसमें भारत अपनी तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है और IIT (ISM) धनबाद अपने शोध के जरिए इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. पंडाल के माध्यम से आम लोगों को यह बताने की कोशिश की गई है कि देश के भविष्य, स्वच्छ ऊर्जा और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के विकास में इन खनिजों की कितनी बड़ी भूमिका है.
🔬 कुलसचिव प्रबोध पांडेय ने दी जानकारी, लिथियम और सेमीकंडक्टर चिप्स पर आधारित है सजावट
संस्थान के कुलसचिव प्रबोध पांडेय ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, कॉपर और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की उपयोगिता को दर्शाने के साथ-साथ सेमीकंडक्टर चिप्स और इलेक्ट्रॉनिक सर्किट की झलक भी पंडाल में दिखाई गई है. इन सभी संसाधनों का इस्तेमाल मोबाइल फोन, कंप्यूटर, इलेक्ट्रिक वाहनों और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में बड़े पैमाने पर होता है, इसलिए इनका स्वदेशी स्तर पर अनुसंधान और तकनीकी विकास भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. इस वर्ष इस अनोखी थीम को चुनने का मुख्य उद्देश्य लोगों को इनकी अहमियत से अवगत कराना है. भारत सरकार ने संस्थान में क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ को मान्यता दी है और संस्थान इस दिशा में लगातार बेहतरीन शोध कर रहा है.
📜 1977 से चली आ रही है परंपरा, सौ साल पूरे करने की ओर बढ़ रहा प्रतिष्ठित संस्थान
लगभग एक शताब्दी की गौरवशाली शैक्षणिक और शोध परंपरा वाला IIT-ISM धनबाद अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है. खनन और खनिजों के क्षेत्र में संस्थान की पहचान लंबे समय से देश-दुनिया में रही है, और अब क्रिटिकल मिनरल्स तथा सेमीकंडक्टर जैसे आधुनिक क्षेत्रों में शोध के जरिए नई संभावनाओं पर काम किया जा रहा है. आपको बता दें कि IIT (ISM) धनबाद में इस सामुदायिक दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1977 में हुई थी, और दशकों पुरानी यह परंपरा आज भी संस्थान के सभी लोगों को एक सूत्र में पिरोती है. इस बार इस पावन पर्व को वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी आत्मनिर्भरता के संदेश से जोड़कर ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को पूरा करने का संकल्प लिया गया है.
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