Prahaar Movie Review: राजकुमार राव की फिल्म ‘प्रहार’ का रिव्यू, वकील उज्ज्वल निकम के किरदार में छा गए एक्टर
किसी भी कलाकार की जिंदगी में कुछ ऐतिहासिक और यादगार किरदार अनायास ही जुड़ जाते हैं। साल 2012 में राजकुमार राव की एक बेहतरीन फिल्म आई थी— शाहिद। उस फिल्म में अपने शानदार अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का नेशनल अवॉर्ड मिला था, जिसमें उन्होंने वकील शाहिद आजमी की भूमिका निभाई थी। तब शायद एक्टर ने यह सोचा भी नहीं होगा कि भविष्य में वे कसाब जैसे खूंखार आतंकवादी को फांसी के फंदे तक पहुँचाने वाले देश के विख्यात सरकारी वकील उज्ज्वल निकम का किरदार भी निभाएंगे। लेकिन करीब चौदह साल बाद वह मौका आया और ‘प्रहार- अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ में राजकुमार राव एक बार फिर कोर्टरूम ड्रामा और वकील की भूमिका में पूरी गहराई के साथ उतरे हैं।
आपको बता दें कि शाहिद की तरह यह फिल्म भी एक रियल लाइफ स्टोरी पर आधारित बायोग्राफिकल ड्रामा है। फर्क सिर्फ इतना है कि शाहिद में वह आतंकवाद के झूठे आरोपों में फंसे निर्दोष लोगों को न्याय दिलाकर सुकून पाते हैं, जबकि प्रहार में वे आतंकवादी हमलों के पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाते हैं और अजमल कसाब को फांसी पर लटकाकर देश को न्याय दिलाते हैं।
🎞️ प्रहार की कहानी और 26/11 के काले अध्यायों पर एक नजर
फिल्म में राजकुमार राव के अलावा वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत और सिकंदर खेर जैसे दिग्गज कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म में 1993 के मुंबई बम धमाकों की हल्की सुगबुगाहट का जिक्र है, लेकिन मुख्य रूप से 2008 के मुंबई हमलों की दर्दनाक दास्तां और उसकी लंबी कानूनी लड़ाई को पर्दे पर उकेरा गया है, जिसके केंद्र में प्रसिद्ध वकील उज्ज्वल निकम की भूमिका है।
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फिल्म की शुरुआत और सफर: कहानी उज्जवल निकम की बेटी की शादी के सुखद दृश्य से शुरू होती है, जिसके तुरंत बाद ताज होटल और सीएसटी पर हुए आतंकी हमलों की खौफनाक घटनाएं सामने आती हैं। इसके बाद उज्ज्वल निकम पकड़े गए एकमात्र जिंदा आतंकवादी कसाब के खिलाफ ऐतिहासिक केस लड़ना शुरू करते हैं और यह सफर कसाब के अंजाम यानी फांसी तक पहुँचता है।
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हालांकि, प्रहार की कहानी में कोई बड़ा सरप्राइज या अनप्रिडिक्टेबल मोड़ नहीं है, क्योंकि साल 2008 से 2012 के बीच इस केस से जुड़ी हर बात खुली किताब की तरह जगजाहिर है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब मुंबई हमलों पर पहले ही कई फिल्में और वेब सीरीज बन चुकी हैं, तो दर्शक इस फिल्म को क्यों देखें? लेकिन फिल्म देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि इसका ट्रीटमेंट और ट्रीटमेंट का अंदाज इसे बेहद खास बनाता है।
⚖️ उज्जवल निकम के अंदर और बाहर का ‘प्रहार’
फिल्म जिस खूबसूरती से अपनी बात कहती है, उससे यह अहसास होता है कि आतंकियों का हमला केवल ताज होटल या सीएसटी स्टेशन पर नहीं था, बल्कि यह सीधे तौर पर पाकिस्तान द्वारा भारत की संप्रभुता, इंसानियत, मानवता और न्याय प्रणाली पर किया गया एक गहरा प्रहार था। इसके साथ ही, एक वकील के तौर पर उज्ज्वल निकम के जज्बाती मिशन का उनकी पारिवारिक संवेदनाओं पर भी लगातार प्रहार होता रहा।
कसाब को कानूनी रूप से फांसी के फंदे तक पहुँचाने के लिए उज्ज्वल निकम को चार साल तक लगातार सिर्फ कोर्ट में ही नहीं, बल्कि अपनी निजी जिंदगी में भी भारी दुश्वारियों से जूझना पड़ा। घर के अंदर कभी पत्नी की गंभीर बीमारी, कभी बेटे से उलझन, तो कभी बेटी की शादी; और कानूनी मोर्चे पर पाकिस्तान की कुटिल कूटनीति, अदालत में कसाब के बार-बार बदलते पैंतरे— इन सबका सामना करना अपने आप में किसी बड़े प्रहार को झेलने जैसा ही था। लेकिन निकम साहब ने चट्टान की तरह हर हमले का सामना किया और अंततः देश को न्याय दिलाया।
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राजकुमार राव का बेजोड़ अभिनय: इसमें कोई दोराय नहीं है कि राजकुमार राव ने एक बार फिर उसी शिद्दत और हौसले के साथ वकील का किरदार निभाया है, जिसकी झलक हम शाहिद में देख चुके हैं। यह उनके करियर की एक और अवॉर्ड-विनिंग परफॉर्मेंस कही जा सकती है। उज्ज्वल निकम ने इस केस को कितनी संवेदनशीलता से लड़ा था, इसकी बानोगी फिल्म के उस दमदार संवाद से मिलती है जब वे कसाब से कहते हैं— “मुझे किसी केस को जीतने की खुशी तब तक नहीं मिलती जब तक मुजरिम के भीतर अपनी गलती का अहसास और उसकी टीस पैदा न हो।”
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