Simdega Development News: मरीजों को खटिया पर ले जाने की मजबूरी, नेताओं के आश्वासन के बाद भी नहीं बनी सड़क
सिमडेगा जिले से एक प्रेरणादायक और व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाली तस्वीर सामने आई है, जहां सरकारी और प्रशासनिक उम्मीदें टूटने के बाद ग्रामीणों ने खुद ही अपने इलाके की कमान संभाल ली है। केरसई प्रखंड के चापाबारी से बाकीकोना और धांगरीनाचा तक जाने वाली मुख्य सड़क वर्षों से बेहद जर्जर हालत में थी। नेताओं के आश्वासन और वादों के बाद भी जब रास्ते की स्थिति नहीं सुधरी, तो ग्रामीण हाथ में कुदाल और अन्य औजार लेकर खुद सड़क पर उतर आए। महिलाओं और पुरुषों ने मिलकर श्रमदान करते हुए रास्ते को चलने योग्य बनाने का बीड़ा उठाया है।
🚑 मरीजों को खटिया पर ढोने की है मजबूरी, आदिम जनजाति बहुल गांव के लोग हैं परेशान
ग्रामीणों के मुताबिक करीब 5 किलोमीटर लंबी यह सड़क पिछले कई सालों से बदहाल पड़ी है, जिससे आम आवागमन बेहद कठिन हो गया है। सबसे बड़ी मुसीबत तब खड़ी होती है जब किसी बीमार व्यक्ति या गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाना पड़ता है, क्योंकि एम्बुलेंस न पहुंच पाने के कारण मरीजों को खटिया पर लादकर मुख्य मार्ग तक ले जाना पड़ता है। राशन लाने और रोजमर्रा के कार्यों के लिए भी इसी बदहाल रास्ते का सहारा लेना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि धांगरीनाचा क्षेत्र कोरवा आदिम जनजाति बहुल इलाका है, जहां बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है।
🤝 अनेक बार गुहार लगाने के बाद भी नहीं निकला समाधान, छत्तीसगढ़ सीमा को जोड़ता है यह मार्ग
ग्रामीण हर्षित कोरवा, जगदीश नायक और नेलसन मिंज ने बताया कि इस समस्या को कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के समक्ष उठाया गया, लेकिन केवल कोरे आश्वासन ही मिले। यह महत्वपूर्ण मार्ग सिमडेगा को छत्तीसगढ़ की सीमा से भी जोड़ता है। पूर्व विधायक की पहल पर पहले भी एक बार श्रमदान किया गया था, लेकिन स्थायी निर्माण आज तक नहीं हुआ। आखिरकार कोई विकल्प न बचने पर भुनेश्वर बेसरा और अन्य ग्रामीणों ने खुद ही सड़क दुरुस्त करने का फैसला किया। इस श्रमदान अभियान में बड़ी संख्या में महिला-पुरुषों ने हिस्सा लेकर एकजुटता की अनूठी मिसाल पेश की है।
Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.