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EVM में टोटलाइजर से क्यों नहीं हो सकती वोटों की गिनती?: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब; जानें क्या है पूरा विवाद

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नई दिल्ली: भारत में चुनावी वोटों की गिनती की मौजूदा व्यवस्था एक बार फिर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के सवालों के केंद्र में आ गई है। वर्तमान चुनावी प्रणाली में वोटों की गिनती प्रत्येक पोलिंग बूथ के अनुसार अलग-अलग की जाती है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से सवाल किया है कि जब टोटलाइजर (Totalizer) तकनीक मतदाता की पसंद और गोपनीयता को सुरक्षित रखने में सक्षम है, तो इसे ईवीएम (EVM) की मतगणना में क्यों नहीं अपनाया जा सकता? हालांकि, चुनाव आयोग ने इसके सैद्धांतिक लाभ स्वीकार किए हैं, लेकिन फॉर्म 17C (Form 17C) से मिलान, बूथवार पारदर्शिता और ईवीएम-वीवीपीएटी सत्यापन में आने वाली व्यावहारिक व कानूनी चुनौतियों का हवाला दिया है।

🗳️ क्या है मौजूदा व्यवस्था बनाम टोटलाइजर मेथड?: समझिए वोटों की गिनती का गणित

दोनों मतगणना प्रणालियों में मुख्य अंतर:

  • मौजूदा बूथवार व्यवस्था: वर्तमान में हर पोलिंग बूथ की ईवीएम कंट्रोल यूनिट का रिजल्ट बटन अलग से दबाया जाता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि अमुक बूथ पर किस प्रत्याशी को कितने वोट मिले। इसके बाद फॉर्म 17C के दर्ज आंकड़ों से इसका मिलान कर विधानसभावार कुल योग निकाला जाता है।

  • टोटलाइजर व्यवस्था: टोटलाइजर में लगभग 14 ईवीएम मशीनों को एक साथ कनेक्ट किया जाता है। इससे 14 बूथों का संयुक्त परिणाम एक साथ आता है। नतीजतन, यह तो पता चलता है कि पूरे समूह में किस प्रत्याशी को कितने वोट मिले, लेकिन किसी एक खास बूथ या गांव का वोटिंग पैटर्न पूरी तरह गोपनीय बना रहता है।

🔒 टोटलाइजर की आवश्यकता क्यों?: वोटर की गोपनीयता और सुरक्षा का बड़ा तर्क

टोटलाइजर के पक्ष में दिए जाने वाले मुख्य आधार:

  • राजनीतिक दबाव और बदले की भावना से मुक्ति: बूथवार नतीजे सामने आने से राजनीतिक दलों को पता चल जाता है कि किस गांव या मोहल्ले ने उनके खिलाफ वोट दिया है। इससे चुनाव बाद स्थानीय स्तर पर भेदभाव, धमकी या प्रताड़ना का खतरा बना रहता है।

  • विधि आयोग की सिफारिश: चुनाव आयोग ने सर्वप्रथम 2008 में नियमों में संशोधन की बात कही थी। इसके बाद लॉ कमीशन की 255वीं रिपोर्ट ने भी मतदाताओं को भयमुक्त रखने के लिए टोटलाइजर के इस्तेमाल की सिफारिश की थी।

🛑 अब तक देश में क्यों लागू नहीं हो पाया टोटलाइजर?: राजनीतिक और तकनीकी अड़चनें

अड़चनों और विरोध के प्रमुख कारण:

  • राजनीतिक दलों का विरोध: वर्ष 2016 में जब चुनाव आयोग ने राय मांगी, तब 3 राष्ट्रीय और 18 राज्य स्तरीय दलों ने इसका विरोध किया था। इसके बाद गठित मंत्रियों के समूह (GoM) ने भी इसे हरी झंडी नहीं दी।

  • पारदर्शिता और फॉर्म 17C पर असर: चुनाव आयोग के अनुसार, बूथवार फॉर्म 17C और ईवीएम के आंकड़ों का ‘वन-टू-वन’ मिलान चुनावी प्रक्रिया की शुचिता और स्व-सत्यापन का आधार है।

  • तकनीकी खराबी छिपाने की आशंका: विरोधियों का तर्क है कि यदि कई ईवीएम को एक साथ जोड़ दिया जाएगा, तो किसी एक मशीन में हुई तकनीकी गड़बड़ी की अलग से पहचान करना कठिन हो जाएगा।

🏛️ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: ‘रूल 59A बैलेट पेपर पर लागू है तो EVM पर क्यों नहीं?’

अदालत की अहम टिप्पणियां:

  • चीफ जस्टिस की बेंच का सवाल: 1 सितंबर 2026 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा कि जब चुनाव संचालन नियम (Conduct of Election Rules) के ‘रूल 59A’ के तहत मतपत्रों के मिश्रण (टोटलाइजेशन) का प्रावधान है, तो ईवीएम के लिए नियम क्यों नहीं बनाए जा सकते।

  • जस्टिस बागची की टिप्पणी: जस्टिस जॉयमल्या बागची ने रेखांकित किया कि सैद्धांतिक रूप से टोटलाइजर मतदाता की गोपनीयता सुरक्षित रखने का बेहतरीन जरिया हो सकता है, लेकिन इसके लिए ठोस वैधानिक आधार और चुनावी नियमों में संशोधन की आवश्यकता होगी।

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