Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Dhamanheri Youth Death in UK: बेहतर भविष्य के सपने लेकर इंग्लैंड गए 20 वर्षीय कंवलजीत की अचानक मौत Rewari Food Poisoning News: रेवाड़ी में कन्या पूजन का प्रसाद खाने से तीन बच्चियों की तबीयत बिगड़ी, द... Kurukshetra Police Encounter: कुरुक्षेत्र में पुलिस और नशा तस्करों के बीच जबरदस्त मुठभेड़, 40 लाख का... Tiger Shroff Firing Case: मात्र 34 हजार रुपए में ली गई थी टाइगर की सुपारी, कोटा से गिरफ्तार हुए तीनो... Haryana Police Transfer: हरियाणा में पुलिस विभाग का बड़ा फेरबदल, 28 IPS-HPS अधिकारियों के तबादले Neeraj Kumar Health Update: JDU MLC उम्मीदवार नीरज कुमार को पड़ा दिल का दौरा, पटना के मेदांता अस्पता... Jharkhand Drugs Syndicate: झारखंड में NCB का बड़ा एक्शन, रांची और जमशेदपुर से मास्टरमाइंड जिम्मी समे... Tiger Shroff Firing Case Update: टाइगर श्रॉफ फायरिंग मामले में कोटा से तीनों आरोपी गिरफ्तार, फुटबॉल ... Stock Market Holiday Today: विजयादशमी पर आज बंद रहेगा शेयर बाजार, जानें कब होगी नॉर्मल ट्रेडिंग और क... Karnataka Crime News: कर्नाटक के विजयपुरा में अवैध संबंध के चक्कर में रची गई खौफनाक साजिश, पत्नी ने ...

‘भारत महाशक्ति नहीं, निस्वार्थ सेवा से बना विश्वगुरु’: कनाडा के टोरंटो में बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत

19

टोरंटो (कनाडा): कनाडा के टोरंटो में आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु: दुनिया को मित्रता से अपनाओ’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारतीय सभ्यता के मूल तत्वों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत कभी किसी पर दबाव बनाने वाली ‘महाशक्ति’ बनने की आकांक्षा से आगे नहीं बढ़ा, बल्कि समस्त मानवता की निस्वार्थ सेवा करने के कारण ही स्वाभाविक रूप से ‘विश्वगुरु’ कहलाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्वभौमिक बंधुत्व, शरणागत की रक्षा और असीम विविधता का आदर भारत के सभ्यतागत डीएनए (DNA) का अभिन्न हिस्सा हैं।

📜 नालंदा के छात्रों का त्याग: चीनी यात्री ह्वेन त्सांग की पुस्तकों के लिए दी थी जान

प्राचीन ज्ञान और बलिदान की मिसाल:

  • ह्वेन त्सांग की यात्रा: मोहन भागवत ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि महान चीनी यात्री और विद्वान ह्वेन त्सांग जब नालंदा से ज्ञान और अमूल्य ग्रंथ लेकर लौट रहे थे, तब गंगा नदी पार करते समय उनकी नाव तूफान में घिर गई थी।

  • ज्ञान की रक्षा में बलिदान: नाव का वजन कम करने के लिए जब मल्लाह ने ग्रंथ फेंकने को कहा, तो ह्वेन त्सांग के साथ मौजूद नालंदा के तीन भारतीय छात्रों ने बिना संकोच एक-एक कर नदी में छलांग लगा दी।

  • विश्व कल्याण की भावना: छात्रों ने अपने प्राणों की आहुति इसलिए दी ताकि वह दिव्य ज्ञान सुरक्षित रूप से चीन तक पहुंच सके और वहां के लोगों का कल्याण कर सके।

🛡️ जामनगर के राजा ने दी थी पोलिश शरणार्थियों को शरण: ‘यही भारत की परंपरा’

मानवीय संकट और विविधता में एकता का संदेश:

  • द्वितीय विश्व युद्ध का प्रसंग: भागवत ने याद दिलाया कि दूसरे विश्व युद्ध के समय जब पोलैंड के विस्थापित शरणार्थी भारत पहुंचे, तो तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें शरण देने से मना कर दिया था। उस संकट में स्वतंत्र जामनगर रियासत के महाराजा (दिग्विजय सिंह जी) ने उन्हें गले लगाया और उनके सुरक्षित वतन वापसी तक संरक्षण दिया।

  • बिना मांगे मदद की नीति: उन्होंने कहा कि वैश्विक संकट के समय बिना किसी स्वार्थ के मदद करना ही भारत की शाश्वत परंपरा रही है।

  • विविधता ही एकता: उन्होंने समझाया कि भारत में कई जातियां, भाषाएं और संप्रदाय हैं, परंतु यह अनेकता एकता के मार्ग में बाधा नहीं बल्कि उसकी सबसे सुंदर सजावट और अभिव्यक्ति है।

👑 मिथिला के राजा जनक का स्वप्न: ‘सब कुछ ईश्वरीय है, इसलिए सब हमारा है’

दार्शनिक दृष्टिकोण और आत्मज्ञान:

  • राजा जनक का प्रसंग: संघ प्रमुख ने प्राचीन मिथिला के राजा जनक के स्वप्न का उल्लेख करते हुए बताया कि भौतिक सत्ता, पद और प्रतिष्ठा क्षणभंगुर हैं।

  • संकीर्ण सोच से मुक्ति: उन्होंने कहा कि “यह मेरा है और वह तुम्हारा है” सोचना अत्यंत संकीर्ण मानसिकता है। जब हम यह समझ लेते हैं कि सृष्टि का प्रत्येक कण दिव्य और ईश्वरीय है, तो हम प्रत्येक व्यक्ति को अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं।

  • कर्तव्य भावना: भौतिक दुनिया में रंग-रूप और शरीर भिन्न हो सकते हैं, लेकिन आत्मिक तल पर सब एक हैं; अतः निस्वार्थ भाव से समाज और विश्व की सेवा करना ही मनुष्य का परम कर्तव्य है।

🌏 ‘बिना युद्ध और धर्मांतरण के पूर्वजों ने दुनिया को दिया ज्ञान’: वसुधैव कुटुंबकम् का संदेश

प्राचीन वैश्विक यात्राएं और सांस्कृतिक प्रभाव:

  • पैदल तय कीं सीमाएं: भागवत ने कहा कि जब यातायात के आधुनिक साधन नहीं थे, तब हमारे मनीषी व पूर्वज पैदल ही हिमालय पार कर चीन, साइबेरिया, मंगोलिया और छोटी नावों के सहारे दक्षिण-पूर्व एशिया व मेक्सिको तक पहुंचे।

  • केवल ज्ञान का प्रसार: भारतीय मनीषियों ने कभी किसी देश पर सैन्य आक्रमण नहीं किया और न ही किसी का धर्मांतरण कराया; बल्कि उन्होंने विश्वभर में गणित, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद और उच्च जीवन मूल्यों का प्रकाश फैलाया।

  • वसुधैव कुटुंबकम्: उन्होंने अंत में कहा कि खुले विचार वाले और प्रबुद्ध जन हमेशा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है) के शाश्वत सिद्धांत का अनुसरण करते हैं।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.