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वंदे मातरम् पर कंगना और शर्मिला टैगोर आमने-सामने: ‘हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर निकलें’, कंगना ने दिया स्वामी विवेकानंद का उदाहरण

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मुंबई: पिछले कुछ दिनों से राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ को लेकर सार्वजनिक मंचों पर जोरदार बहस छिड़ी हुई है। इस मुद्दे पर बॉलीवुड की दिग्गज हस्तियों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। हाल ही में वेटरन एक्ट्रेस शर्मिला टैगोर द्वारा दिए गए बयान के बाद अब बॉलीवुड अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत ने अपनी राय रखी है। कंगना ने शर्मिला टैगोर के विचारों से आंशिक सहमति जताते हुए कला और साहित्य को धार्मिक चश्मे से देखने पर आपत्ति जताई है और अपने विचार विस्तार से साझा किए हैं।

🎭 ‘कला और कविता को किसी एक धर्म तक सीमित न रखें’: कंगना रनौत का बयान

शर्मिला टैगोर का वीडियो साझा करते हुए कंगना रनौत ने अपनी बात रखी:

  • सीमित सोच पर हैरानी: कंगना ने कहा कि वे शर्मिला टैगोर की सराहना करती हैं, लेकिन एक कलाकार के तौर पर कविताओं और कला को लेकर उनकी इतनी सीमित सोच देखकर हैरान हैं।

  • कवि की कल्पना का विस्तार: उन्होंने कहा कि एक रचनाकार अपनी रचनाओं में प्रभाव पैदा करने के लिए कल्पना को व्यापक आयाम देता है।

  • बंकिम बाबू के संघर्ष का प्रतीक: कंगना के अनुसार, वंदे मातरम् स्वतंत्रता सेनानी बंकिम चंद्र चटर्जी के अंतर्मन और संघर्षों का प्रतीक है, जो मनुष्य को उसकी आंतरिक शक्ति से परिचित कराता है। इसे किसी एक विशेष धर्म के दायरे में नहीं बांधा जाना चाहिए।

  • विवेकानंद का उदाहरण: कंगना ने स्वामी विवेकानंद के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि जब उन्होंने फौलादी युवाओं की बात की थी, तो वह युवाओं की ऊर्जा का प्रतीक था। उन्होंने कहा, “कृपया हिंदू-मुस्लिम वाले संकीर्ण विचार से बाहर निकलें और एक-दूसरे को गले लगाएं।”

🗣️ क्या था शर्मिला टैगोर का बयान, जिस पर शुरू हुआ विवाद?

शर्मिला टैगोर ने एक हालिया इंटरव्यू में राष्ट्रीय गीत को लेकर अपनी राय रखी थी:

  • एकेश्वरवाद और बहुदेववाद का तर्क: शर्मिला टैगोर ने कहा था कि भारत में कई ऐसे धर्म हैं जो केवल एक ईश्वर (एकेश्वरवाद) में विश्वास रखते हैं, जबकि वंदे मातरम् के बाद के छंदों में कई देवी-देवताओं का उल्लेख मिलता है।

  • सभी धर्मों का समावेश: उन्होंने तर्क दिया था कि एक ईश्वर को मानने वालों के लिए कुछ शब्दों का उच्चारण असहज हो सकता है।

  • शुरुआती दो छंदों का समर्थन: शर्मिला टैगोर का मानना था कि भारत की बहुधर्मीय विविधता को साथ लेकर चलने के लिए ‘वंदे मातरम्’ के पहले के दो छंद सबसे उपयुक्त और सर्वमान्य हैं।

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