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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बुजुर्ग माता-पिता बच्चों को कर सकते हैं संपत्ति से बेदखल, हाईकोर्ट का आदेश पलटा

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिक और बुजुर्ग माता-पिता जरूरत पड़ने पर अपने बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं।

जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि बढ़ती उम्र का अर्थ किसी भी सूरत में असुरक्षा या अपमान नहीं होना चाहिए। प्रत्येक नागरिक को जीवन भर सम्मान और गरिमा के साथ जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस पूर्व आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें बेटे और बहू को घर से बेदखल करने के ट्रिब्यूनल कोर्ट के फैसले को खारिज किया गया था। कोर्ट ने दो टूक कहा कि बुजुर्गों की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल के पास बेदखली का आदेश देने का पूरा वैधानिक अधिकार है।

🏛️ कानून का मकसद बुजुर्गों की सुरक्षा, सभ्य समाज की पहचान उनके सम्मान से

खंडपीठ ने भरण-पोषण कानून के मूल उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:

  • गरिमा और सुरक्षा: जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस अराधे की बेंच ने कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का प्राथमिक उद्देश्य समाज के बुजुर्गों को गरिमा, सुरक्षा और मानसिक शांति प्रदान करना है।

  • सभ्य समाज की कसौटी: अदालत ने टिप्पणी की कि किसी भी सभ्य समाज का स्तर और उसकी परिपक्वता इस बात से तय होती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितना सम्मान, सुरक्षा और गरिमा प्रदान करता है।

📍 क्या है पूरा मामला? 81 वर्षीय मां को वृद्धाश्रम भेजने पर शुरू हुआ विवाद

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लखनऊ के एक पारिवारिक विवाद से जुड़ी विशेष अनुमति याचिका पर आया है:

  • विवाद की पृष्ठभूमि: यह मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी मकान मालिक रवि कांत गुप्ता की अपील से जुड़ा था।

  • दादी को वृद्धाश्रम भेजा: विवाद की शुरुआत तब हुई जब रवि कांत गुप्ता की 81 वर्षीय वृद्ध मां को कथित तौर पर जबरन वृद्धाश्रम भेज दिया गया।

  • डीएम कोर्ट में अपील: बेटे और बहू के इस व्यवहार से आहत होकर रवि कांत ने 5 जून 2022 को जिला मजिस्ट्रेट (DM) के समक्ष ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ के तहत बेटे और बहू को अपनी स्व-अर्जित संपत्ति से बेदखल करने की अर्जी लगाई।

📋 जिला मजिस्ट्रेट ने दिया था बेटे-बहू को बेदखल करने का आदेश

प्रशासनिक स्तर पर जांच के बाद बुजुर्ग के पक्ष में फैसला सुनाया गया था:

  • एसडीएम का आदेश: उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) ने 15 नवंबर 2022 को जांच में पाया कि मकान रवि कांत गुप्ता की अपनी कमाई (स्व-अर्जित) से बना है और उनके बेटे ने अपनी ही दादी को घर में नहीं रहने दिया तथा लगातार कलह और उपद्रव किया।

  • कब्जा सौंपने का निर्देश: एसडीएम और बाद में 9 अगस्त 2023 को जिला मजिस्ट्रेट ने आदेश की पुष्टि करते हुए बेटे और उसकी पत्नी को मकान खाली कर कब्जा रवि कांत गुप्ता को सौंपने का निर्देश दिया। इसके खिलाफ बेटा और बहू इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए।

🚫 सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश किया खारिज, ट्रिब्यूनल का अधिकार रखा बरकरार

हाईकोर्ट द्वारा डीएम के फैसले को पलटे जाने के बाद मामला देश की शीर्ष अदालत पहुंचा:

  • हाईकोर्ट की व्याख्या: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम के तहत अधिकारियों को बेदखली (Eviction) का आदेश देने का अधिकार नहीं है, और डीएम के आदेश को रद्द कर दिया था।

  • सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करके बड़ी भूल की है।

  • स्थापित कानून: शीर्ष अदालत ने दोहराया कि यह स्थापित कानून है कि वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण, संरक्षण और शांतिपूर्ण जीवन के उद्देश्य से गठित ट्रिब्यूनल के पास बच्चों को संपत्ति से बेदखल करने का पूर्ण अधिकार है।

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