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कर्मचारी अपनी पसंद की जगह पोस्टिंग का दावा नहीं कर सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण AFR फैसला

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बिलासपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के स्थानांतरण और पदस्थापना से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण AFR (Approved For Reporting) मामले में बड़ा विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने स्पष्ट किया है कि कोई भी शासकीय या निगम कर्मचारी किसी विशेष स्थान पर अपनी पदस्थापना या ट्रांसफर को मौलिक अथवा विधिक अधिकार नहीं मान सकता। न्यायालय ने कहा कि प्रशासनिक आवश्यकताओं, कार्यकुशलता और विभागीय व्यवस्था के अनुरूप किसी कर्मचारी का स्थानांतरण करना पूरी तरह सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह टिप्पणी उस याचिका को खारिज करते हुए की गई, जिसमें एक कर्मचारी ने अपने मूल पदस्थापना स्थल (नगर पालिक निगम, रायपुर) में वापस भेजे जाने की मांग करते हुए बाद में किए गए स्थानांतरण को चुनौती दी थी।

📍 रायपुर से शुरू हुआ स्थानांतरण का सिलसिला, रिसाली और भिलाई-चरौदा होते हुए पहुंचा राजनांदगांव

इस मामले के प्रशासनिक घटनाक्रम का विवरण इस प्रकार है:

  • मूल नियुक्ति: कर्मचारी की प्रारंभिक नियुक्ति नगर पालिक निगम रायपुर में हुई थी।

  • लगातार तबादले: इसके बाद उसे रायपुर से नगर पालिक निगम रिसाली और फिर रिसाली से नगर पालिक निगम भिलाई-चरौदा स्थानांतरित किया गया।

  • कर्मचारी का तर्क: कर्मचारी का दावा था कि स्वीकृत पदों की तुलना में उसे दोनों स्थानों पर सरप्लस (अतिरिक्त) कर्मचारी माना गया, इसलिए नियमानुसार उसे उसके मूल संस्थान रायपुर नगर निगम में वापस प्रत्यावर्तित (Revert) किया जाना चाहिए था।

📜 अभ्यावेदन और अवमानना याचिका के बाद भी नहीं मिली रायपुर में पोस्टिंग, राजनांदगांव किया गया ट्रांसफर

रायपुर में पुनः पदस्थापना पाने के लिए कर्मचारी ने लंबी विधिक प्रक्रिया अपनाई:

  • न्यायालय का निर्देश व सुनवाई: हाईकोर्ट के निर्देश पर कर्मचारी ने विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत किया। समय-सीमा में फैसला न होने पर अवमानना कार्यवाही प्रारंभ हुई, जिसके दौरान सक्षम प्राधिकारी ने कर्मचारी को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया।

  • राजनांदगांव ट्रांसफर का नया आदेश: सुनवाई के उपरांत सक्षम प्राधिकारी ने कर्मचारी को रायपुर वापस भेजने के बजाय भिलाई-चरौदा से नगर पालिक निगम राजनांदगांव स्थानांतरित कर दिया।

  • आदेश को चुनौती: कर्मचारी ने इस नए स्थानांतरण आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि सरप्लस होने की दशा में उसकी सहमति लेकर प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर समायोजन किया जाना चाहिए था।

🏢 पोस्टिंग का स्थान तय करना पूर्णतः प्रशासनिक निर्णय, न्यायालय नहीं कर सकता हस्तक्षेप

प्रार्थी की दलीलों को खारिज करते हुए जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने प्रशासनिक शक्तियों को स्पष्ट किया:

  • प्रशासन का सर्वाधिकार: कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी पदस्थापना स्थल पर सरप्लस है, तो उसे किस अन्य निगम या स्थान पर समायोजित किया जाए, यह पूरी तरह प्रशासनिक आवश्यकता और नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता है।

  • पसंद का दावा अमान्य: कोई भी कर्मचारी केवल अपनी व्यक्तिगत सुविधा या पसंद के आधार पर किसी विशेष निकाय या शहर में पोस्टिंग की मांग नहीं कर सकता।

  • न्यायिक सीमाएं: अदालत सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारियों के निर्णयों के स्थान पर अपनी पसंद या कर्मचारी की सुविधा के आधार पर पदस्थापना तय नहीं कर सकती।

🔄 बार-बार स्थानांतरण होना अपने आप में अवैधता का आधार नहीं

हाईकोर्ट ने बार-बार तबादले को लेकर उठाए गए कानूनी बिंदुओं को भी खारिज कर दिया:

  • लगातार ट्रांसफर की वैधता: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी का एक से अधिक बार या क्रमिक रूप से स्थानांतरण होना, अपने आप में बाद वाले आदेश को अवैध या गैर-कानूनी नहीं ठहराता।

  • हस्तक्षेप का आधार नहीं: रायपुर से रिसाली, रिसाली से भिलाई-चरौदा और उसके बाद राजनांदगांव स्थानांतरण के बावजूद केवल लगातार ट्रांसफर के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

🏛️ सुप्रीम कोर्ट के नम्रता वर्मा केस का हवाला: नियोक्ता का निर्णय सर्वोपरि

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में देश की शीर्ष अदालत के स्थापित कानूनी सिद्धांतों का उल्लेख किया:

  • सुप्रीम कोर्ट की नजीर: कोर्ट ने ‘नम्रता वर्मा बनाम राज्य शासन उत्तर प्रदेश एवं अन्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत का उल्लेख किया।

  • नियोक्ता का अधिकार: कर्मचारी नियोक्ता से यह आग्रह करने का अधिकार नहीं रखता कि उसे केवल फलां जगह भेजा जाए या अमुक स्थान से न हटाया जाए। जनहित और प्रशासनिक आवश्यकता के अनुसार निर्णय लेने का अंतिम अधिकार नियोक्ता के पास है।

📌 याचिका खारिज, राजनांदगांव स्थानांतरण आदेश बरकरार: जानिए इस AFR फैसले का कानूनी सार

हाईकोर्ट ने कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत तर्कों में कोई कानूनी आधार न पाते हुए याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया:

  • ठोस आधार का अभाव: कोर्ट ने पाया कि प्रार्थी ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह सिद्ध हो सके कि स्थानांतरण आदेश दुर्भावनापूर्ण (Malafide), कानूनी रूप से अस्थिर या मनमाना है।

  • फैसले का मुख्य निष्कर्ष: स्थानांतरण कर्मचारी का सेवा अधिकार नहीं बल्कि प्रशासनिक विषय है। जब तक किसी आदेश में नियमों का खुला उल्लंघन या दुर्भावना सिद्ध न हो, अदालतें प्रशासनिक तबादलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगी।

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