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इलाहाबाद हाईकोर्ट की राज्य सरकार को कड़ी फटकार: गोवंश ले जाने पर वाहन जब्ती व नीलामी अवैध, ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश

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प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ‘उत्तर प्रदेश गोवंश वध निवारण अधिनियम’ के अंतर्गत एक वाहन को अवैध रूप से जब्त और नीलाम किए जाने के मामले में राज्य सरकार एवं प्रशासनिक तंत्र को कड़ी फटकार लगाई है।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि पर्याप्त विधिक आधार एवं साक्ष्यों के बिना किसी वाहन को जब्त करना और तत्पश्चात उसकी नीलामी कर देना पूरी तरह से गैर-कानूनी और असंवैधानिक था। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित वाहन मालिक को दो लाख रुपये का हर्जाना (मुआवजा) अदा करे।

⚖️ केवल गोवंश ले जाने से वध का अनुमान नहीं लगाया जा सकता: न्यायमूर्ति संदीप जैन

इलाहाबाद हाईकोर्ट में पीड़ित वाहन मालिक द्वारा एक याचिका दायर की गई थी।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि उसके वाहन को गोवंश वध हेतु ले जाने के झूठे आरोप में प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा जब्त किया गया और बाद में उसकी नीलामी कर दी गई। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि केवल इस आधार पर कि वाहन में गोवंश ले जाया जा रहा था, यह कतई नहीं माना जा सकता कि उन्हें कटाई या वध के उद्देश्य से ही ले जाया जा रहा था।

📜 ‘राज्य के भीतर गोवंश परिवहन के लिए परमिट अनिवार्य नहीं’, केवल संदेह पर कार्रवाई अवैध

अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में रेखांकित किया कि उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा के भीतर गोवंश के परिवहन हेतु किसी विशेष परमिट की आवश्यकता नहीं है।

राज्य सरकार की ओर से यह सिद्ध नहीं किया जा सका कि गोवंश को वध के उद्देश्य से राज्य की सीमाओं से बाहर ले जाया जा रहा था। ऐसी स्थिति में वाहन की जब्ती और उसके उपरांत की गई नीलामी पूर्णतः अवैध, असंवैधानिक एवं मनमानी थी। केवल आशंका और संदेह के आधार पर किसी नागरिक के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय गोवंश परिवहन प्रकरणों में प्रशासनिक मनमानी की न्यायिक समीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

💰 7 दिनों के भीतर ₹2 लाख का मुआवजा देने का आदेश, दोषी अधिकारी से वसूली का विकल्प

उच्च न्यायालय ने कहा कि पुलिस और प्रशासन की इस एकतरफा कार्रवाई से वाहन मालिक को अपूरणीय आर्थिक क्षति हुई है, क्योंकि वह वाहन उसकी आजीविका का एकमात्र प्रमुख साधन था।

अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह कम से कम 2 लाख रुपये की मुआवजा राशि सात दिनों के भीतर पीड़ित को अनिवार्य रूप से प्रदान करे। अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार चाहे तो यह राशि उस संबंधित प्रशासनिक/पुलिस अधिकारी के वेतन या पेंशन से वसूल सकती है, जिसने इस मामले में अवैध कार्रवाई की थी।

🏛️ “संदेह के आधार पर कार्रवाई नहीं हो सकती, पहले भी हाईकोर्ट दे चुका है ऐसे स्पष्ट निर्देश”

“इलाहाबाद उच्च न्यायालय पूर्व में भी अपने कई निर्णयों में यह व्यवस्था दे चुका है कि उत्तर प्रदेश के भीतर गोवंश को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए किसी विशेष परिवहन परमिट की बाध्यता नहीं है। जब तक यह ठोस रूप से प्रमाणित न हो कि गोवंश को वध हेतु राज्य से बाहर भेजा जा रहा था, तब तक गोवंश वध निवारण अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत वाहन जब्ती की कार्रवाई नहीं की जा सकती।”

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