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प्रभास का स्टारडम भी नहीं बचा पाएगा फिल्म! खराब डबिंग से लेकर कमजोर स्क्रिप्ट तक, ये 5 गलतियां पड़ीं भारी

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प्रभास की फिल्म ‘द राजा साब’ को लेकर जो माहौल बनाया गया था, वो किसी दिवाली के रॉकेट जैसा था, यानी शोर बहुत, लेकिन जब फटा तो सिर्फ धुआं ही धुआं. फैंस उम्मीद लगाए बैठे थे कि डार्लिंग प्रभास एक बार फिर बॉक्स ऑफिस पर सुनामी लाएंगे, लेकिन निर्देशक मारुति की इस हॉरर-कॉमेडी ने दर्शकों को मनोरंजन के नाम पर ऐसा ‘टॉर्चर’ दिया है जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी. तो आइए बात करते हैं उन 5 वजहों की, जिन्होंने साउथ के ‘डार्लिंग’ प्रभास की फिल्म का बेड़ा गर्क कर दिया.

1.कहानी

फिल्म ‘द राजा साब’ की लंबाई 190 मिनट है. जी हां, पूरे 3 घंटे से ज्यादा! एडिटिंग की ऐसी हालत है कि फिल्म खत्म होने का नाम ही नहीं लेती. कहानी बीच में इतनी सुस्त हो जाती है कि दर्शक स्क्रीन पर भूत ढूंढने के बजाय पॉपकॉर्न के दाने गिनने लगते हैं. सच तो ये है कि फिल्म के भूतों से ज्यादा डर थिएटर की दीवार पर टंगी उस घड़ी से लगता है, जिसकी सुइयां हिलने का नाम नहीं लेतीं. इंटरवल के बाद कहानी जिस कछुए की रफ्तार से चलती है, उसे देखकर अच्छे-भले इंसान का सब्र जवाब दे जाए. अगर फिल्म की ट्रिमिंग सही होती, तो शायद यह थोड़ी और इम्पैक्टफुल लगती.

2. बिना लॉजिक के सीन

इस फिल्म को देखकर लग रहा है कि निर्देशक मारुति ने शायद लॉजिक को घर पर छोड़कर फिल्म बनाई है. फिल्म की तीन-तीन हीरोइनों (मालविका, निधि और रिद्धि) को सिर्फ ‘शो-पीस’ बनाकर रख दिया गया. गजब का सीन तो वो है जहां पूरी टीम ट्रैकिंग गियर पहनकर पहाड़ चढ़ रही है, वहां हमारी हीरोइन साड़ी में इस तरह पहाड़ फतह कर रही हैं, जैसे की किसी रैंप पर कैटवॉक. इसे ‘स्टाइल’ कहें या ‘सेंस’ का कत्ल? इसका जवाब तो शायद फिल्म के मेकर्स ही सही से दे पाएंगे.

3. हॉरर है या कॉमेडी?

फिल्म में तंत्र-मंत्र भी है, सम्मोहन (हिप्नोटिस्म) भी और भूत-प्रेत सब कुछ है. मेकर्स इसे ‘कॉम्बो पैक’ कह रहे थे, लेकिन ये तो ‘हॉच-पॉच’ बन गया. फिल्म देखते वक्त दर्शक इस ऊहापोह में रहते हैं कि अब डरना है, हंसना है या फिर इस ‘टॉर्चर’ के लिए खुद को कोसना है. कहानी की टोन इतनी जल्दी बदलती है कि गिरगिट भी शरमा जाए.

4. बोमन ईरानी जैसे दिग्गजों की ‘बर्बादी’

फिल्म में बोमन ईरानी जैसे मंझे हुए कलाकार हैं, लेकिन उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वो बस फिल्म में हाजिरी लगाने आए थे. इतने बड़े सपोर्टिंग कास्ट का ऐसा इस्तेमाल देखकर दुख होता है. टैलेंटेड एक्टर्स बिना किसी तुक-ताल के कहानी में आते-जाते रहते हैं, जैसे किसी शादी के रिसेप्शन में मेहमान. ऐसा लगता है जैसे स्क्रिप्ट लिखते वक्त किरदारों की गहराई पर नहीं, बल्कि सिर्फ पोस्टर पर बड़े नामों को छापने पर ध्यान दिया गया है.

5. खराब गाने

फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष है इसके हिंदी गानों की खराब डबिंग. हमने ‘RRR’ और ‘पुष्पा’ जैसी फिल्में देखी हैं, जहां हिंदी वर्जन के गाने इतने परफेक्ट थे कि लगता ही नहीं था कि ये कोई साउथ की फिल्म है. लेकिन ‘द राजा साब’ में गाने सुनते वक्त ऐसा लगता है जैसे किसी ने जबरदस्ती शब्दों को धुन में ठूंस दिया हो. गानों की डबिंग इतनी ‘आउट ऑफ प्लेस’ लगती है कि ये गाने आपको जुबां पर चढ़ने के बजाय कानों में चुभते हैं. इस खराब डबिंग की वजह से फिल्म वो ‘इम्पैक्ट’ पैदा ही नहीं कर पाई जो एक पैन-इंडिया फिल्म को करना चाहिए.

प्रभास का स्क्रीन प्रेजेंस और उनका स्टारडम अपनी जगह कायम है, लेकिन ‘द राजा साब’ एक ऐसी फिल्म साबित हुई, जो सिर्फ स्टार के दम पर अपनी नैया पार करने की कोशिश करने में लगी है. कमजोर कहानी, खराब एडिटिंग और बेमजा डबिंग की वजह से इस ‘राजा साब’ को जल्द ही बॉक्स ऑफिस की गद्दी से नीचे उतारना पड़ सकता है.

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