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बिसाहड़ा कांड: उस रात क्या हुआ था? अखलाक की हत्या का घटनाक्रम

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अखलाक हत्याकांड में यूपी सरकार को बड़ा झटका लगा है. सूरजपुर कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने वाली याचिका खारिज कर दी है. इसके साथ ही कोर्ट ने अभियोजन की ओर से केस वापसी की अर्जी को महत्वहीन और आधारहीन करार देते हुए निरस्त कर दिया है. आरोपियों के खिलाफ केस जारी रहेगा. इस पर पीड़ित पक्ष के वकील का कहना है कि हमारे पक्ष को न्याय मिला है. केस की अगली सुनवाई 6 जनवरी को है. कोर्ट ने डे बाय डे सुनवाई के निर्देश दिए हैं. आइए जानते हैं दादरी के उस गांव में 28 सितंबर 2015 की रात क्या-क्या हुआ था.

नोएडा के बिसाहड़ा गांव में 28 सितंबर 2015 की रात दिल दहला देने वाली वारदात हुई थी. रात का वक्त था, जब अफवाहों और उन्माद की आग ने मोहम्मद अखलाक की जान ले ली थी. ये वारदात देश में मॉब लिंचिंग की सबसे भयावह घटनाओं में गिनी जाती है. बकरीद के कुछ दिन बाद इस बात को हवा दी गई कि अखलाक के घर में गोमांस है और बछड़े की हत्या की गई है. बिना सच जाने ये बात जंगल की आग की तरह फैली. माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया, जिसने रात के अंधेरे में हिंसा का रूप ले लिया.

रात के करीब साढ़े दस बज रहे थे

देखते ही देखते सैकड़ों लोगों की भीड़ अखलाक के घर के बाहर इकट्ठी हो गई. अब रात के करीब साढ़े दस बज रहे थे. उन्मादी भीड़ ने अखलाक के घर का दरवाजा तोड़ दिया और अंदर घुस गई. अखलाक और उनके बेटे दानिश को बाहर घसीटा गया. दोनों पर लाठियों, ईंटों और पत्थरों की बौछार कर दी गई. तड़पती-बिलखती घर की महिलाएं मदद की गुहार लगाती रहीं लेकिन भीड़ के सिर पर खून सवार था.

हालात बेकाबू हो चुके थे. भीड़ ने अखलाक की जान ले ली. दानिश गंभीर रूप से घायल हो गया. लंबे समय तक वो अस्पताल में मौत से जंग लड़ता रहा. कई बार ब्रेन सर्जरी भी करानी पड़ी. इस वारदात ने देश को झकझोर दिया. संसद से सड़कों और सोशल मीडिया तक तीखी बहस छिड़ी. ये मामला कानून-व्यवस्था, सामाजिक सहिष्णुता और उन्मादी भीड़ की मानसिकता पर बड़ा सवाल बन गया.

मांस को सबूत के तौर पर जब्त किया गया

वारदात के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की. तनाव को देखते हुए गांव में भारी सुरक्षा बल तैनात किया गया. अखलाक के घर से बरामद मांस को सबूत के तौर पर जब्त किया गया, जिसे जांच के लिए भेजा गया. पुलिस की कार्यशैली और कार्रवाई पर पीड़ित परिवार ने गंभीर सवाल उठाए. परिवार ने कहा कि समय रहते पुलिस पहुंचती तो अखलाक की जान बच सकती थी.

इसके बाद रिपोर्ट आई उस मांस की, जिसे लेकर अफवाह फैलाई गई थी. पहले पशु चिकित्सा रिपोर्ट में मांस को मटन बताया गया. जबकि बाद में मथुरा लैब की रिपोर्ट में कहा गया कि मांस गाय या उसके वंश का था. इन रिपोर्टों ने जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए. पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई है.

19 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट

ये मामला देश में बहस का केंद्र बन गया. कई लेखकों और कलाकारों ने अपने पुरस्कार लौटाए. दुनियाा ने भारत में बढ़ती मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर सवाल उठाए. इन सबके बीच 19 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई. इनमें गांव के प्रभावशाली लोग और एक स्थानीय बीजेपी नेता का बेटा भी था. हालांकि मुकदमे की सुनवाई की गति से पीड़ित परिवार की उम्मीदें बार-बार टूटती रहीं.

घटना के बाद अखलाक के परिवार को बिसाहड़ा छोड़ना पड़ा. पत्नी न्याय के लिए अदालतों के चक्कर काटती रही. कई गवाहों के बयान बदलने की बातें भी सामने आईं. परिवार ने आरोप लगाया कि गवाहों पर दबाव बनाया गया.

केस वापस लेने की अर्जी

इसके बाद अक्टूबर 2025 में प्रदेश सरकार ने केस वापस लेने की अर्जी दाखिल की. इससे नया विवाद खड़ा हो गया. सरकार ने सामाजिक सौहार्द और गवाहों के विरोधाभासी बयानों को इसकी वजह बताया. अखलाक की पत्नी ने सरकार के इस कदम को हाईकोर्ट में चुनौती दी. उनका कहना था कि केस वापस लेने से उन्हें कभी न्याय नहीं मिल पाएगा. अब सूरजपुर कोर्ट ने सरकार की केस वापसी की अर्जी को खारिज कर दिया है.

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