Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Congress Election Result: अभिषेक चौधरी को मिले सबसे ज्यादा 6.15 लाख वोट, राजस्थान यूथ कांग्रेस अध्यक... Rajasthan Kinnar House Theft: पुरानी रंजिश की आशंका के तहत पुलिस कर रही जांच, अज्ञात आरोपियों की तला... Chimur Ashramshala Controversy: डैंड्रफ की समस्या के नाम पर छात्रों के साथ अजीब सलूक, वायरल तस्वीरों... BJP vs Shinde Sena: नागपुर में बीजेपी के सामने बागी पूर्व विधायक की चुनौती, सीटों के बंटवारे के बाद ... Ulhasnagar Mahayuti Crisis: महाराष्ट्र में महायुति में पड़ी फूट! बीजेपी ने शिंदे सेना से अलग होने का... CM Vishnu Deo Sai Singapore Visit: छत्तीसगढ़-सिंगापुर साझेदारी से खुलेंगे विकास के नए रास्ते, ग्रीन ... Chhattisgarh PMAY Success: छत्तीसगढ़ में बिना सरकारी खर्च के मिली 25,413 आवासों के लिए जमीन, केंद्र ... Kanker Divyang Camp: जगदलपुर में 7 अक्टूबर को लगेगा निःशुल्क दिव्यांग शिविर, कलेक्टर कुन्दन कुमार ने... Raipur Police Reshuffle: मुख्यमंत्री और राजभवन सुरक्षा में बदले गए अधिकारी, गृह विभाग ने जारी किया न... Sahibganj Murder Mystery Solved: साहिबगंज में गौरचंद्र बागती हत्याकांड का खुलासा, चचेरा भाई ही निकला...

दिल्ली को आर्थिक झटका! प्रदूषण के चलते बढ़ रहा स्वास्थ्य खर्च और घट रहा उत्पादन, शहर की ‘तिजोरी’ में हो रहा बड़ा नुकसान

31

सर्दियों ने एक बार फिर दस्तक दे दी है, और इसके साथ ही दिल्ली-एनसीआर का आसमान ज़हरीली धुंध की चादर में लिपट गया है. यह अब कोई चौंकाने वाली खबर नहीं, बल्कि एक सालाना त्रासदी बन गई है, जिसे करोड़ों लोग हर साल जीने के लिए मजबूर हैं. लेकिन यह संकट अब सिर्फ हमारे फेफड़ों तक सीमित नहीं रहा; यह हमारी जेबों, हमारे काम और हमारे भविष्य पर सीधा हमला कर रहा है.

हालात इतने गंभीर हैं कि एक हालिया सर्वे ने खतरे की घंटी बजा दी है. इस सर्वे के मुताबिक, दिल्ली में रहने वाले हर 10 में से 4 लोग (यानी 40 प्रतिशत) इस दमघोंटू माहौल से बचने के लिए शहर ही छोड़ देना चाहते हैं. यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस हताशा का सबूत है जो राजधानी की हवा में घुल चुकी है. जब एक शहर, जो कभी अवसरों का केंद्र माना जाता था, ‘गैस चैंबर’ में तब्दील हो जाए, तो यह न केवल स्वास्थ्य का, बल्कि एक गंभीर आर्थिक संकट का भी संकेत है.

टैलेंट हब की साख दांव पर

यह शायद प्रदूषण के इस संकट का सबसे डराने वाला और मानवीय पहलू है. दिल्ली, जिसे अपनी प्रतिभा (Talent) और अवसरों के लिए जाना जाता था, आज उस साख को खोने की कगार पर है. हाल ही में दिल्ली के 17,000 निवासियों पर किए गए एक सर्वे ने इस कड़वी सच्चाई को सामने ला दिया है. इसमें शामिल 40 प्रतिशत लोगों ने साफ कहा कि वे वायु प्रदूषण और इसके गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों से बचने के लिए दिल्ली से बाहर बसने को प्राथमिकता देंगे.

यह पलायन की सोच सिर्फ आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग तक ही सीमित नहीं है. एक अलग अध्ययन में यह पाया गया कि दिल्ली में काम करने वाले लगभग 57 प्रतिशत प्रवासी श्रमिक (Migrant Workers) भी अब दिल्ली के मुकाबले अपने गृह नगर में रहना ज़्यादा पसंद कर रहे हैं. इसकी कई वजहों में से एक यहाँ की खराब हवा की गुणवत्ता है.

यह रुझान दिल्ली के भविष्य के लिए एक बड़ी चेतावनी है. अगर प्रतिभा (Talent) और श्रम (Labour), यानी एक शहर को चलाने वाली दोनों मुख्य धुरियां ही उससे मुंह मोड़ने लगेंगी, तो ‘टैलेंट हब’ के तौर पर दिल्ली का आकर्षण हमेशा के लिए खतरे में पड़ सकता है.

अर्थव्यवस्था का कैसे घुट रहा है दम?

यह ज़हरीली हवा सिर्फ हमारी सेहत नहीं, बल्कि दिल्ली की तिजोरी को भी खाली कर रही है. दिल्ली, जो देश की राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र है, उसे इस प्रदूषण की बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही है. आंकड़ों पर नज़र डालें तो, साल 2019 में वायु प्रदूषण की वजह से दिल्ली को 5.6 अरब डॉलर का सीधा आर्थिक नुकसान हुआ. एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली को सालाना अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 6% से अधिक का नुकसान हो रहा है. व्यापारी संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) चेयरमैन बृजेश गोयल के मुताबिक, प्रदूषण के कारण दिल्ली के व्यापार को रोजाना लगभग 100 करोड़ रुपए का नुक़सान हो रहा है.

यह नुकसान कई स्तरों पर हो रहा है. जब हवा में सांस लेना मुश्किल हो, तो लोग घरों से बाहर निकलने से बचते हैं. इसका सीधा असर उपभोक्ता अर्थव्यवस्था (Consumer Economy) पर पड़ता है. बाज़ार वीरान हो जाते हैं और खरीदारी ठप पड़ जाती है. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राहकों के फुटफॉल (customer footfall) में कमी आने से अर्थव्यवस्था को अरबों का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है.

इतना ही नहीं, सर्दियों का मौसम दिल्ली में पर्यटन का पीक सीजन होता है. लेकिन “दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी” की छवि विदेशी पर्यटकों को दूर भगा रही है. पर्यटन क्षेत्र को पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट से अरबों का नुकसान हो रहा है. सीटीआई के मुताबिक, जहां रोजाना एनसीआर से 3 से 4 लाख लोग खरीददारी के लिए दिल्ली आते थे, प्रदूषण के कारण इनकी संख्या घटकर 1 लाख रह गई है.

हर सांस की चुकानी पड़ रही है भारी क़ीमत

प्रदूषण का एक और घातक असर है जो आंकड़ों में तो दिखता है, लेकिन अकसर चर्चा से बाहर रहता है, हमारी कार्यक्षमता (Productivity) पर हमला. जब कर्मचारी बीमार होंगे या पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएंगे, तो कंपनियों का मुनाफा सीधे तौर पर प्रभावित होगा.

DW की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में अकेले आईटी सेक्टर को प्रदूषण की वजह से उत्पादकता में कमी के चलते सालाना 1.3 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ रहा है. वहीं, नियोक्ताओं (Employers) को कार्य दिवसों (Working Days) में कमी आने से सालाना 6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है.

लेकिन यह सब आर्थिक नुकसान उस मानवीय त्रासदी के आगे फीका पड़ जाता है, जिसे भारत हर साल झेलता है. विश्व बैंक की रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2019 में, भारत में वायु प्रदूषण के कारण 17 लाख लोगों की असमय मौत हुई. यह उस साल हुई कुल मौतों का 18 प्रतिशत था. अर्थव्यवस्था को इन असमय मौतों से 45 अरब डॉलर का भारी नुकसान हो रहा है.

₹3.21 करोड़ की कृत्रिम बारिश भी बेअसर

यह समस्या दशकों पुरानी है, लेकिन हमारे समाधान आज भी ‘तात्कालिक’ और आधे-अधूरे हैं. हर साल सर्दियों से ठीक पहले संस्थाएं हरकत में आती हैं, बैठकें होती हैं और कुछ अस्थायी कदम उठाए जाते हैं.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में हुई कृत्रिम बारिश की कोशिश है. इस पर कुल 3.21 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो पांच ट्रायल के लिए निर्धारित बजट था. एक अनुमान के अनुसार, प्रत्येक ट्रायल पर औसतन 64 लाख रुपये खर्च हुए. लेकिन नतीजा, दिल्ली के बड़े हिस्से में पर्याप्त कृत्रिम बारिश नहीं हो पाई और कुछ हिस्सों में सिर्फ हल्की फुहारें ही पड़ीं.

यह दिखाता है कि हम समस्या की जड़ पर काम करने के बजाय हर साल महंगे, लेकिन बेअसर प्रयोगों पर निर्भर हैं. जैसे ही गर्मियां आती हैं, ये सारे वादे और प्रयास ठंडे बस्ते में चले जाते हैं. पूरा उत्तर भारत, जो खेती के लिहाज़ से सबसे उपजाऊ है, वह भी प्रदूषण की इस भयंकर चपेट में है. जानकारों का कहना है कि जब तक इस समस्या का स्थायी और साल भर चलने वाला समाधान नहीं खोजा जाता, तब तक दिल्ली-एनसीआर की हवा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था, तीनों का दम घुटता रहेगा.

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.