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प्रेमानंद महाराज की प्रेरक कहानी: भ्रष्टाचार से पैसा कमाने वाले का अंत कैसा होता है? जानें, क्या है जीवन का सबसे बड़ा सत्य

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कई बार इंसान भ्रष्टाचार और अनैतिकता से पैसा कमाता है, लेकिन अंतरात्मा इसकी इजाजत नहीं देती है, फिर भी धन के लालच में वह ऐसा करता चला जाता है. इसी को लेकर वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज से एक व्यक्ति ने कहा कि अनैतिकता से धन अर्जित करता हूं. पता होता है गलत कर रहा हूं, लेकिन मन संकेत देता है कि सभी कर रहे हैं तो सही ही है. उसकी इस बात पर महाराज ने उसे समझाया. यही नहीं, उन्होंने एक कहानी भी सुनाई और बताया कि एक अपवित्र माया किस तरह सबकुछ खत्म कर देती है.

युवक के सवाल का जवाब देते हुए प्रेमानंद महाराज ने कहा कि जो लोग अनैतिकता से धन अर्जित कर रहे हैं वो भोग भी रहे हैं. थोड़ा अपनी आवश्यकताओं को कम करना चाहिए. यदि हम धर्म पूर्वक चलें तो ज्यादा अच्छा रहेगा. हमें बेईमानी और अनैतिकता का धन नहीं लेना चाहिए. जो धन अर्जित कर लिया है उसे गौशाला और बीमार लोगों व फ्री में जहां दवा बांटी जाती है वहां दे देना चाहिए.

उन्होंने कहा कि हमेशा धर्म पूर्वक कमाना और खाना चाहिए, जिससे बच्चों का भविष्य उज्ज्वल हो और परिवार सुखी जीवन व्यतीत कर सके. हो सकता है कि आज आपका माहौल बहुत बढ़िया हो सकता है, कल जब इसका परिणाम आएगा वो ठीक नहीं रहेगा इसलिए सभी से प्रार्थना है कि अपने धर्म की कमाई पर नजर रखें और अधर्म से बचने की कोशिश करें.

प्रेमानंद महाराज ने क्या सुनाई कहानी?

प्रेमानंद महाराज ने कहा कि अनैतिक कमाई विष के समान है और वो मार ही देती है. ये सौ फीसदी समझ लेना चाहिए कि अधर्म की कमाई इंसान को मार ही देगी. उन्होंने उदाहरण देते हुए एक कहानी के जरिए समझाया कि एक रास्ते में अशर्फियों की थैली पड़ी हुई थी और उस रास्ते से संत जा रहे थे. वह थैली रज यानी मिट्टी से ढकी हुई थी. उस थैली पर उनका पैर लग गया तो उन्होंने देखा कि ये तो अशर्फियां हैं. शिष्य न देख ले तो उसे फिर से रज से ढक दिया.शिष्य ने कहा कि गुरु जी ये तो कुछ है, तो दौड़कर उसने खोला तो उसमें अशर्फियां थीं. संत ने कहा कि इसे ढक दे मत उठाना, ये जहर है. ये मार डालेगी. ये अपवित्र है.

शिष्य ने कहा कि गुरु जी मुझे इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा है कि ये मार कैसे डालेगी? उन्होंने कहा कि इसे यहीं रख दो और चुपचाप झाड़ी में छुप जाओ. हम आपको दिखाते हैं कि माया कैसे मार डालेगी. जहां जाएगी उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर देगी. अपवित्र माया और अधर्म का स्वरूप यही होता है. इसी दौरान चार राज सैनिक घोड़ों पर चढ़कर वहां से निकले, तो एक सैनिक की नजर पड़ गई, वह बोला कि इस पोटली में सैकड़ों अशर्फियां हैं. उसने कहा कि आज हमारे भाग्य खुल गए.

चारों पेड़ के नीचे बैठ गए और कहा कि चार हिस्से कर लिए जाएं. एक ने कहा कि इसमें से चार अशर्फियां निकाल लीजिए और बढ़िया भोजन खरीदकर लाते हैं और उसे पाते हैं. नजदीक में बाजार था तो दो सैनिक चार अशर्फियां लेकर बाजार गए. उन दोनों ने विचार किया कि इसके चार हिस्से क्यों होने चाहिए, इसके तो दो होने चाहिए, जिसमें हम दोनों का हिस्सा हो. एक ने बोला कि भोजन में विष मिला दीजिए. इसे खाकर दोनों मर जाएंगे, फिर दोनों अपना-अपना हिस्सा बांट लेंगे. दोनों सैनिकों ने खुद अच्छा भोजन किया और अपने दो साथियों के लिए विष युक्त भोजन लेकर चल दिए.

उधर, आराम कर रहे दूसरे सैनिकों ने सोचा कि इन अशर्फियों के चार हिस्से कैसे होंगे, बाजार गए दोनों सैनिकों को आते ही मार देंगे, फिर इसके दो हिस्से कर लेते हैं. इस पर दोनों सैनिक राजी हो गए. जैसे ही दोनों सैनिक भोजन लेकर आए वैसे ही उन्हें मार दिया. मारने के बाद दोनों सैनिकों ने भोजन किया, जैसे ही भोजन किया वैसे ही वो दोनों भी मर गए. बाबा जी ने अपने शिष्य से कहा कि देखा न, इस अपवित्र माया ने मार डाला. यहां से भाग चलो इसे मत उठाना. इसलिए अधर्म का पैसा बुद्धि को दूषित करता है.

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