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राजस्थान के रास्ते कर्नाटक में कांग्रेसः सिद्धारमैया के करीबियों ने डीके शिवकुमार के खिलाफ क्यों खोला मोर्चा?

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साल 2020 में राजस्थान कांग्रेस में जिस तरह की कलह देखने को मिली थी, उसी तरह की उठापटक अब कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में भी नजर आ रही है. लोकसभा चुनाव बाद सिद्धारमैया सरकार के 3 मंत्रियों ने डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इन मंत्रियों का कहना है कि कर्नाटक में एक की बजाय कम से कम 3 उप मुख्यमंत्री हो.

मोर्चा खोलने वाले 3 मंत्री हैं- बी.जेड जमीर खान, केएन राजन्ना और सतीश जरकिहोली. कर्नाटक में इन तीनों ही मंत्रियों को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का करीबी माना जाता है. हालांकि, सिद्धारमैया ने पूरे मामले को हाईकमान पर छोड़ दिया है.

2019 लोकसभा चुनाव के बाद राजस्थान में भी इसी तरह से कांग्रेस के भीतर सत्ता का संघर्ष शुरू हुआ था, जो 2020 आते-आते विद्रोह में बदल गया. राजस्थान में उस वक्त मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट गुट के बीच शक्ति को लेकर विवाद हुआ था.

राजस्थान के रास्ते पर कर्नाटक कांग्रेस क्यों?

1. राजस्थान के फॉर्मूले पर बंटी थी सत्ता की हिस्सेदारी

2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले दम पर सरकार बनाने में कामयाब हो गई, जिसके बाद दिल्ली में सरकार गठन को लेकर खूब माथापच्ची हुई थी. आखिर वक्त में कांग्रेस हाईकमान ने राजस्थान जैसा फॉर्मूला कर्नाटक में निकाला था.

इस फॉर्मूले के तहत कद्दावर नेता सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया गया था. डिप्टी सीएम के साथ-साथ शिवकुमार को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की भी जिम्मेदारी दी गई थी. राजस्थान में 2018 में कांग्रेस ने ऐसा ही फॉर्मूला बनाया था.

उस वक्त अशोक गहलोत को पार्टी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी दी थी, जबकि सचिन पायलट को डिप्टी सीएम और प्रदेश अध्यक्ष का पद सौंपा गया था.

2. राजस्थान में भी इसी तरह शुरू हुई थी बगावत

कर्नाटक में जिस तरह से सिद्धारमैया के मंत्री शिवकुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. उसी तरह 2019 के बाद सचिन पायलट के खिलाफ अशोक गहलोत और उनके मंत्रियों ने मोर्चा खोला था. जुलाई 2019 में अशोक गहलोत ने पत्रकारों से कहा था कि यहां कोई 2 नेता नहीं है, वोट मेरे नाम पर मिले हैं और इसलिए मैं मुख्यमंत्री हूं.

धीरे-धीरे दोनों गुटों में तकरार बढ़ता गया और आखिर में जुलाई 2020 में पायलट अपने 30 करीबी विधायकों के साथ राजस्थान से निकल गए, जिसके बाद राज्य में सरकार गिरने की नौबत आ गई. हालांकि, हाईकमान की पहल पर सचिन पायलट मान गए.

1. लोकसभा चुनाव में डीके नहीं कर पाए करिश्मा

लोकसभा चुनाव में शिवकुमार परफॉर्मेंस नहीं कर पाए हैं. कर्नाटक में शिवकुमार का गढ़ बेंगलुरु है, जहां की सभी सीटें कांग्रेस पार्टी हार गई है. खुद शिवकुमार के भाई डीके सुरेश बेंगलुरु ग्रामीण सीट से चुनाव हार गए हैं.

शिवकुमार के करीबी रामालिंगा रेड्डी की बेटी सौम्या भी बेंगलुरु दक्षिण से चुनाव हार गई हैं. दिलचस्प बात है कि डीके सुरेश और सौम्या रेड्डी की हार का अंतर ढाई लाख से ज्यादा वोटों की है.

इतना ही नहीं, शिवकुमार जिस जाति वोक्कलिगा से आते हैं, उसके वोटर्स भी एनडीए की तरफ शिफ्ट हो गए. सीएसडीएस के मुताबिक 2023 के विधानसभा चुनाव में जेडीएस और बीजेपी को वोक्कलिगा समुदाय का 41 प्रतिशत वोट मिला था, जो अब बढ़कर 44 प्रतिशत हो गया है.

2. ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले को कुंद करने की रणनीति

कर्नाटक में 2023 में जब सरकार बनी तो यह चर्चा थी कि शुरुआत के ढाई साल सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बनेंगे और उसके बाद के ढाई साल शिवकुमार. इस फॉर्मूले का न तो हाईकमान ने कभी खंडन किया और न ही दोनों नेताओं ने. सरकार गठन का एक साल से ज्यादा समय हो चुका है.

अब लोकसभा चुनाव बाद सिद्धारमैया गुट पहले ही डीके पर हमलावर होकर इस फॉर्मूले को कुंद करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

3. दलित-मुससमानों की हिस्सेदारी भी बड़ी वजह

कर्नाटक में पहले विधानसभा चुनाव और अब लोकसभा चुनाव में दलित और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कांग्रेस का जमकर समर्थन किया है. सीएसडीएस के मुताबिक लोकसभा चुनाव में 66 प्रतिशत दलितों ने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया है, जबकि एनडीए को सिर्फ 32 प्रतिशत दलितों का वोट मिला.

कर्नाटक के 92 प्रतिशत मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट दिया है. वहीं बीजेपी को 8 प्रतिशत मुसलमानों का वोट मिला है. ऐसे में मुस्लिम और दलित नेताओं ने डिप्टी सीएम पद पर दावेदारी ठोक दी है.

वहीं डिप्टी सीएम के इस पूरे बवाल पर शिवकुमार ने भी प्रतिक्रिया दी है. पत्रकारों के एक सवाल पर नाराजगी जाहिर करते हुए शिवकुमार ने कहा- पार्टी मंत्रियों को समय आने पर उचित जवाब देगी. लोग सुर्खियों में आने के लिए इस तरह का डिमांड कर रहे हैं. शिवकुमार ने आगे कहा कि सीएम और डिप्टी सीएम बनाने का फैसला हाईकमान का होता है.

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