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18 जनवरी को मनाई जाएगी मासिक दुर्गाष्टमी, धन-धान्य के लिए करें इस स्तोत्र का पाठ

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रूप मातु को अधिक सुहावे ।दरश करत जन अति सुख पावे ॥

तुम संसार शक्ति लय कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥

अन्नपूर्णा तुम जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥

प्रलयकाल सब नाशनहारी । तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥

शिव योगी तुम्हरे गुन गावें । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥

रूप सरस्वती का तुम धारा । दे सुबुधि ऋषि-मुनिन उबारा ॥

धर्‍यो रूप नरसिंह को अम्बा । परगट भईं फाड़ कर खम्बा ॥

रक्षा करि प्रहलाद बचायो । हिरनाकुश को स्वर्ग पठायो ॥

लक्ष्मी रूप धरो जग जानी । श्री नारायण अंग समानी ॥

क्षीरसिन्धु में करत बिलासा । दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ॥

मातंगी धूमावति माता । भुवनेश्वरि बगला सुखदाता ॥

श्री भैरव तारा जग-तारिणि । छिन्न-भाल भव-दुःख निवारिणि ॥

केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

कर में खप्पर-खड्‍ग बिराजै । जाको देख काल डर भाजै ॥

सोहै अस्त्र विविध त्रिशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥

नगरकोट में तुम्हीं बिराजत । तिहूँ लोक में डंका बाजत ॥

शुम्भ निशुम्भ दैत्य तुम मारे । रक्तबीज-संखन संहारे ॥

महिषासुर दानव अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥

रूप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तेहि संहारा ॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब । भई सहाय मातु तुम तब तब ॥

अमर पुरी अरू बासव लोका । तव महिमा सब रहें अशोका ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावै । दुख-दारिद्र निकट नहिं आवै ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई । जन्म-मरण ता कौ छुटि जाई ॥

योगी सुर-मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥

शंकर आचारज तप कीनो । काम-क्रोध जीति तिन लीनो ॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । अति श्रद्धा नहिं सुमिरो तुमको ॥

शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछितायो ॥

शरणागत ह्‍वै कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा । दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरे दुख मेरो ॥

आशा तृष्णा निपट सतावैं । मोह-मदादिक सब बिनसावैं ॥

शत्रु नाश कीजै महरानी । सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥

करहु कृपा हे मातु दयाला । ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला ॥

जब लग जिओं दया फल पावौं । तुम्हरो यश मैं सदा सुनावौं ॥

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै । सब सुख भोग परमपद पावै ॥

देवीदास शरण निज जानी । करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥

डिसक्लेमर

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