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जाड़े की जठराग्नि में ज्वार की रोटी, लहसुन चटनी

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इंदौर। शीत का मौसम अब रवानी पर है। सुबह-शाम की हवा कोहरे के इशारे पर शरारती हो चली है। शीत हड्डियों तक में प्रवेश कर रही है और कंपकंपी में गुनगुनाने लगता है देह का शास्त्रीय संगीत। इसी शीत से लड़ने के लिए हमारी देह के बीचोबीच एक गरम ताप की भट्टी है। आदिम भूख से भरी यह भट्टी है जठराग्नि, जिसे हम पेट कहते हैं। शीत जठर की अग्नि को प्रज्वलित कर देता है और इन दिनों भोजन के यज्ञ का आनंद बढ़ जाता है। इस मौसम में गेहूं का हाथ छोड़ें और ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का का साथ थामें। इनसे गर्मी भी मिलेगी और स्वाद भी। मैग्नीशियम, कैल्शियम, मैग्नीज, ट्रिप्टोफेन, फास्फोरस, फाइबर…सब इनमें है। चूल्हे की आंच पर सिके टिक्कड़ और लहसुन की चटनी, मानो समूची सृष्टि का आनंद।

इंदौर से चली समीक्षा मुंबई में दिखाई धमक

इन दिनों सिनेमागृहों में एनिमल नामक फिल्म जारी है, जिसके नायक पर जानवरों जैसा वहशीपन तारी है। हिंसा, मारकाट, रक्तपात व अल्फा मेल जैसे मर्दाना-मसाले से रची गई यह फिल्म समाज के लिए कितनी घातक है, इसका मुजाहिरा इंदौर ने बताया। यहां के एक आलोचक ने फिल्म की समीक्षा लिखी और इसे हिंसा में डूबी रक्तरंजित तलवार साबित कर दिया। समीक्षा इतनी प्रभावी रही कि इसकी धमक मुंबई में भी सुनाई दी। अंतत: एनिमल फिल्म के वहशीपन पर शर्मिंदा फिल्म इंडस्ट्री के कुछ संवेदनशील लोगों ने इस समीक्षा को इस फिल्म के निर्देशक तक पहुंचाने की जिम्मेदारी ली है, ताकि निर्देशक यह जान सके कि समाज उनके दिमागी हिंसक कचरे का प्रतिकार कर रहा है।

विद्वान का निधन और मरघट-सी खामोशी

इसे भारत का दुर्भाग्य ही कह लीजिए कि यहां किसी उद्भट विद्वान का देहावसान हो जाता है और जमाने को पता भी नहीं चलता। विद्वान की अर्थी सजकर श्मशान तक चली जाती है और सब ऐसे निर्विकार बने रहते हैं, मानो रोज की तरह एक और चला गया। समाज में मरघट-सा सन्नाटा छाया रहता है और चिता पर लेटा व विद्वान इस सन्नाटे के कारण एक बार फिर मर जाता है। बीते दिनों यही हुआ, जब संस्कृत के प्रकांड विद्वान आचार्य कमलेश दत्त त्रिपाठी का देहावसान हुआ। मध्य प्रदेश को अपनी श्रेष्ठता से आलोकित करने वाले आचार्य ने जब रुग्ण हो चली देह को त्यागा, तो इसकी सूचना छिटपुट वाट्सएप ग्रुपों पर ही दिखाई दी। जिस विद्वान ने पूरा जीवन सनातन की सेवा में लगा दिया, वे चुपचाप इस दुनिया से चले गए। न शोक संदेश लिखे गए, न रुदन मचा, न मोमबत्तियां जलीं, न आंखें भीगीं। हे आचार्य, यदि आप बालीवुड में छोटे-मोटे कलाकार भी होते तो यह उथली दुनिया आपके जाने पर ज्यादा रुदन मचा लेती।

शिला की जगह लगा दे प्राण…ठाठ से कर मंदिर निर्माण

जो लोग वर्ष 1992 के श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से किसी भी प्रकार जुड़े रहे, वे इन दिनों अति प्रसन्न हैं। उनका मन हर्षित और तन पुलकित है। जनवरी में भक्तवत्सल श्रीराम का भव्य मंदिर जो बनकर तैयार हो रहा है। बीते दिनों इसी खुशी में एक शख्स का आनंद आंखों से अश्रुओं के रूप में फूट पड़ा। उन्होंने 1992 के आंदोलन में भाग लिया था और लाठी भी खायी थी। हुआ यूं कि ओटले पर धूप में बैठे-बैठे पुराने दौर की बात निकल आई। बात निकली तो फिर अयोध्याजी तक चली गई। वे सज्जन अचानक उठे और घर के अंदर से 50-60 पन्नों की छोटी-सी पुस्तिका निकाल लाए। उस पर लिखा था- शिला की जगह लगा दे प्राण…ठाठ से कर मंदिर निर्माण। यह पुस्तिका वहां बैठे लोगों की ओर आगे बढ़ाते हुए वे अपनी यादों में खो गए।

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