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200 साल पुराने रायपुर के कृष्ण मंदिरों में नंदोत्सव की परंपरा, नामकरण संस्कार में लगाते हैं भोग

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जन्माष्टमी के दिन चांदी के झूले पर विराजमान कान्हा को झुलाने के लिए महिलाओं की लंबी कतार लगती है। श्रावण माह से लेकर जन्माष्टमी तक प्रतिदिन अलग-अलग वस्तुओं से झूले की साजसज्जा की जाती है।

गोकुल चंदमा हवेल मंदिर

ऐतिहासिक बूढ़ा तालाब से थोड़ी ही दूरी पर स्थित गोकुल चंद्रमा हवेली मंदिर 200 साल पुराना है। इस मंदिर में श्रीकृष्ण के बाल रूप की पूजा की जाती है, जो गोकुल चंद्रमा के नाम से प्रसिद्ध है। बृज क्षेत्र के मंदिरों में निभाई जाने वाली परंपरा का पालन इस मंदिर में किया जाता है। दिन में चार बार अलग-अलग समय पर पट खोला जाता है। श्रद्धालु पट खुलने का इंतजार करते हैं। पट खुलने के पश्चात दर्शन, पूजन, प्रसादी वितरण होते ही पट बंद कर दिया जाता है। दर्शन करने के लिए सुबह, दोपहर, शाम और रात्रि में शयन का समय निर्धारित है।

अन्य मंदिरों की तरह गोकुल चंद्रमा मंदिर दिनभर नहीं खोला जाता। बाल रूप भगवान को दूध और अन्न सकरी का भोग अर्पित किया जाता है। दिन में चार बार भगवान को अलग-अलग तरह का भोग अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद भक्तों को प्रसाद वितरित किया जाता है। जन्माष्टमी के दिन चांदी के झूले पर विराजमान कान्हा को झुलाने के लिए महिलाओं की लंबी कतार लगती है। श्रावण माह से लेकर जन्माष्टमी तक प्रतिदिन अलग-अलग वस्तुओं से झूले की साजसज्जा की जाती है। जन्माष्टमी के अलावा फाल्गुन माह की आमलकी यानी कुंज एकादशी, ज्येष्ठ माह की भीमसेनी एकादशी, आषाढ़ माह की देवशयनी और कार्तिक माह की देवउठनी एकादशी पर दर्शन करने भक्तों का हुजूम उमड़ता है।यहां वसंत पंचमी से लेकर धुलेंडी तक 40 दिवसीय रंगोत्सव का आयोजन प्रसिद्ध है।

गोपाल मंदिर सदरबाजार

सदरबाजार का गोपाल मंदिर भी 150 साल से अधिक पुराना है, मंदिर में जुगलजोड़ी सरकार यानी राधा-कृष्ण की मनमोहक प्रतिमा है। जन्माष्टमी पर आधी रात को अभिषेक पूजन के पश्चात दूसरे दिन नंदोत्सव मनया जाता है। नंदबाबा द्वारा खुशियां मनाने और भगवान शंकर के भेष बदलकर आने का मंचन किया जाता है। मंदिर में मथुरा में निभाई जाने वाली परंपरा का पालन किया जाता है। जिस दिन मथुरा में जन्माष्टमी मनाई जाती है, उसी दिन सदरबाजार के मंदिर में जन्माष्टमी मनाने की परंपरा आजादी से पहले से चली आ रही है। नंदोत्सव में माहेश्वरी समाज, राजस्थानी समाज, जैन समाज समेत अन्य समाज के लोग हजारों की संख्या में शामिल होते हैं।

सावन में प्रतिदिन सजता है झूला

माहेश्वरी समाज की महिलाएं पूरे सावनभर तक झूला का श्रृंगार करती हैं। प्रतिदिन अलग-अलग तरह से सावन झूला सजाया जाता है। फल, फूल, पेड़-पौधे, काजू, किशमिश, बादाम, पान बीड़ा समेत अनेक तरह की चीजों से सजे मनमोहक झूले का दर्शन करने भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

प्रत्येक एकादशी को कथा

मंदिर के पुजारी द्वारा प्रत्येक माह में पड़ने वाली दोनों एकादशियों की व्रत कथा सुनाई जाती है। मंदिर में कथा सुनने के बाद ही महिलाएं व्रत का पारणा करती हैं।

कोतवाली थाने में कृष्ण जन्मोत्सव का मंचन

शहर के ह्दय स्थल कोतवाली थाने में पिछले कुछ सालों से जन्माष्टमी पर्व पर आधी रात को कान्हा के जन्म लेने का मंचन करने की शुरुआत की गई है। इसके लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव समिति द्वारा पुलिस प्रशासन से विशेष अनुमति ली जाती है। कोतवाली थाने के लाकअप रूप में वासुदेव, देवकी के बंद होने और आधी रात को कान्हा के जन्म का मंचन किया जाता है। असली पुलिस वाले भी पहरेदार की भूमिका में होते हैं। जन्माष्टमी की रात 12 बजे कोतवाली थाने की लाइटें बंद कर दी जाती है। दो वर्दीधारी कॉन्स्टेबल सो जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कंस के प्रहरी भगवान के जन्म के बाद सो गए थे। श्रीकृष्ण के पिता वासुदेव बालक कृष्ण के प्रतिरूप को टोकरी में रखकर सिर पर उठाकर सदरबाजार स्थित राधाकृष्ण मंदिर में ले जाते हैं, जहां आधी रात को जन्मोत्सव की धूम मचती है।

जैतूसाव मठ में मालपुआ

पुरानी बस्ती के जैतुसाव मठ में चांदी का झूला सजाया जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव के छठे दिन छठ्ठी मनाई जाती है। छत्तीसगढ़ में छठ्ठी का अर्थ होता है, जन्म के बाद छठे दिन किया जाने वाला नामकरण संस्कार। इस दिन मालपुआ का भोग लगाते हैं। मालपुआ का प्रसाद ग्रहण करने हजाराें श्रद्धालु पहुंचते हैं।

इस्कान मंदिर टाटीबंध

टाटीबंध इलाके में इस्कान (इंटरनेशनल सोसाइटी फार कृष्णा कान्शियसनेस) मंदिर प्रसिद्ध है। इसे श्री राधा रासबिहारी मंदिर भी कहा जाता है। इस्कान मंदिर में तीन दिनों तक भक्तिमय और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में अनेक बच्चे कान्हा का रूप धारण करते हैं। भक्ति गीत और नृत्य प्रतियोगिता में युवतियां अपनी प्रतिभा दिखाती हैं। मुंबई, मथुरा से भजन मंडलियाें की प्रस्तुति होती है। जन्माष्टमी के तीसरे दिन दोपहर में पूजन, प्रसादी के साथ समापन होता है।

कारावास के सात दरवाजे

इसके अलावा जवाहर नगर स्थित राधा कृष्ण मंदिर में भी कृष्ण के जन्म लेने वाले स्थान कारावास के सात दरवाजों को फूलों से सजाया जाता है।आधी रात को बिजली के चमकने, बादल गरजने जैसी आवाज को संगीत से प्रस्तुत किया जाता है।समता कालोनी के राधा-कृष्ण मंदिर को सजाने कोलकाता से फूल कारीगर आते हैं। समता कालोनी में ही श्याम खाटू के मंदिर को सफेद फूलों से श्रृंगार किया जाता है। जन्माष्टमी पर 56 भोग आकर्षण का केंद्र होता है।

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