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माता का अद्भुत मंदिर, जहां कर्ण को मिला सोना दान करने का वरदान

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इंदौर। भारत भूमि मान्यताओं की धनी है जहां आस्था के धरातल पर विश्वास पनपता है और सकारात्मकता का फल मन को संतृप्त करता है। यूं तो देश के हर हिस्से में कोई न कोई कहानी, चमत्कार और परंपरा अपनी सुनहरी छटा लिए नजर आती है लेकिन जब बात किसी धार्मिक नगरी की हो जिसका वर्णन वेद-पुराणों में भी हो तो वहां और उसके आसपास ऐसे स्थलों की कमी नहीं जहां मान्यता और विश्वास दोनों का संयुक्त रूप हो।

ऐसा ही एक स्थान है श्री महाकाली मंदिर जिसे आम बोलचाल में करेडी माता, मां कनकावती या मां कनकेश्वरी भी कहा जाता है। यह स्थान है उज्जैन जिले के तराना तहसील के करेडी गांव में जहां यूं तो हर दिन भक्तों की कतार लगती है लेकिन मंगलवार को यहां आस्था का मेला लगता है।

कहा जाता है कि यह वह स्थान है जहां कुंती पुत्र कर्ण ने तपस्या की थी। लंबी तपस्या के बाद भी जब देवी महाकाली ने दर्शन नहीं दिए तो उन्होंने यहां तेल के कढ़ाव में कूदकर अपना जीवन खत्म कर दिया। कर्ण की तपस्या से प्रसन्न हो हाथ में अमृत पात्र लेकर देवी प्रगट हुई और कर्ण को जीवित कर दिया। देवी ने प्रतिदिन सोना दान करने का सामर्थ्य भी कर्ण को प्रदान किया। इसके बाद कर्ण की प्रार्थना पर देवी यहां महाकाली रूप में ही स्थापित भी हो गई।

करीब आठ फीट ऊंची देवी की इस अष्टभुजी मूर्ति के हाथ में खड़ग, खपर, त्रिशूल, कटार, कमंडल और मुंडमाल भी है। यहां देवी के एक हाथ में पात्र बना हुआ है जिसमें सदा प्राकृतिक जल भरा रहता है। माना जाता है कि यह अमृत पात्र है और इसमें भरा जल सामान्य नहीं बल्कि अमृत है। भक्त इस अमृत को अपने साथ भी ले जाते हैं।

इतिहास के मायने से भी है खास

मंदिर केवल धार्मिक मान्यताओं की दृष्टि से ही खास नहीं बल्कि यह इतिहास के नजरिए से भी खास है। यहां राजा भर्तृहरि भी तपस्या करने आते थे और उस काल में मंदिर का जीर्णोद्धार भी किया गया था। मंदिर में ऐसी कई मूर्तियां हैं जो क्षेत्र में हुई खोदाई में मिली और उन्हें यहां स्थापित कर दिया गया। इसमें अधिकांश मूर्तियां भगवान शिव और सर्प की हैं। इतिहास का अध्ययन करने वाले भी यहां आते हैं।

और भी हैं मान्यता

मंदिर के मुख्य पुजारी जगदीश नाथ बताते हैं देवी की यह मूर्ति दिन में तीन बार तीन रूप में नजर आती है। सुबह बाल अवस्था, दोपहर में युवा और शाम को वृद्ध अवस्था में देवी के दर्शन होते हैं। देवी ने कर्ण को दान करने का वरदान दिया इसलिए लोग यहां अपनी आर्थिक परेशानी दूर करने की मनोकामना लिए भी आते हैं। प्रति मंगलवार को सुबह देवी के मस्तक पर भक्त फूल चिपकाकर मन्नत मांगते हैं। यदि फूल गिर गया तो मन्नत पूरी हुई और यदि नहीं गिरा तो समझो कि कामना मन में ही रहेगी।

इसमें कितनी सचाई है यह अलग बात है लेकिन हकीकत यह है कि चंद घंटों में ही कई भक्त यहां मनोकामना लिए फूल चिपकाने आ जाते हैं। यहां रंगपंचमी के बाद आने वाले पहले मंगलवार को चार दिवसीय मेला भी आयोजित किया जाता है। नवरात्र में भी यहां मेला लगता है।

खूबसूरत स्थान और पिकनिक का केंद्र

यह प्राचीन मंदिर हरियाली के बीच बना हुआ है। घने वृक्षों की छांव के बीच यहां भक्तों का मेला लगता है। यहां पिकनिक करने वालों की भी खासी संख्या रहती है। भक्तों की संख्या और सुविधा को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में यह कई सुधार कार्य हो गए हैं। पेयजल की भी यहां व्यवस्था है तो भोजन बनवाने और भोजन कराने के लिए भी कमरे बनाए जा चुके हैं। यहां सुविधागृह भी बनाया जा चुका है। शहर की आबोहवा से दूर यह स्थान सुकून तलाशने वालों के लिए भी बेहतर विकल्प है।

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